मानव के “स्वत्व” स्वतंत्रता एवं अधिकार के लिए मानव ही प्रमाणों का आधार है। प्रत्येक मानव स्वयं को प्रमाणित करना भी चाहता है। मानव को प्राप्त शिक्षा-संस्कारों में प्रत्येक मानव को प्रमाणित करने की अथवा प्रमाणित होने की, स्व-प्रमाणों पर विश्वास होने की अथवा कराने का स्पष्ट बिंदु, स्पष्ट विश्लेषण, स्पष्ट प्रकिया पूर्वक स्पष्ट प्रयोजनों के साथ मानव के अधिकारों को जोड़ा नहीं गया (अथवा जोड़ना संभव नहीं हुआ था)। जबकि प्रत्येक मानव में जीवन समान है। जीवन शक्तियाँ समान है, जीवन बल समान है, जीवन लक्ष्य समान हैं, समाज-लक्ष्य समान हैं, व्यवस्था लक्ष्य समान है (जीवन सहज समानता के आधार पर) जीवन सहज शक्ति, बल, लक्ष्य संभावनाओं की समानता के आधार पर ही संबद्ध रहना पाया जाता है। जीवन लक्ष्य जागृति है।

इस कारण जागृति सहज मानव में जानने-मानने, पहचानने-निर्वाह करने की पूर्णता है और समाज तथा व्यवस्था लक्ष्य में समानता सहज आवश्यकताएं स्वयं स्फूर्त होना पाई जाती हैं। इस क्रम में मानव को अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का साक्षात्कार करना और इसे साकार करना सहज है। इसी विधि से मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान प्रस्तुत है।

मूल्यों का प्रमाण, जानने का प्रमाण, मानने का प्रमाण, पहचानने का प्रमाण, निर्वाह करने का प्रमाण, नियम का प्रमाण, न्याय का प्रमाण, सत्य सहज प्रमाण, अस्तित्व सहज प्रमाण, सहअस्तित्व सहज प्रमाण, जीवन कार्य सहज प्रमाण, व्यवस्था सहज कार्यों का प्रमाण, विकास सहज प्रमाण, संक्रमण सहज प्रमाण, रचना सहज प्रमाण, विरचना सहज प्रमाणों को मानव ही प्रस्तुत करता है। इसमें से आंशिक प्रक्रियाओं को किसी भी यंत्र अथवा जीवों को सिखाकर मानव ने स्वयं को धन्य मान लिया। उल्लेखनीय बात यही है कि स्वयं को प्रमाण का आधार होने का गौरव स्वीकारना, इसको प्रमाणित करना प्रतीक्षित रहा है। इसके लिए जीवन ज्ञान सम्पन्नता सहित शिक्षा के मानवीयकरण के अनंतर मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान, व्यवहारवादी समाजशास्त्र (मानवीय आचार संहिता रूपी संविधान) और आवर्तनशील अर्थव्यवस्था को हृदयंगम करने के क्रम में मानव में स्वयं के प्रति विश्वास करना फलतः श्रेष्ठता के प्रति सम्मान करना संभव हो जाता है। इस विधि से मानव अपने में संतुष्टि संपन्न होता है। सर्वतोमुखी समाधान, स्वानुशासन, समाज न्याय, व्यवसाय में स्वावलम्बन प्रमाणित होता है। यही स्वयं में संतुष्ट होने का प्रमाण है। व्यवहार प्रमाण में ही लक्षण और वस्तुयें (अथवा लक्षणों सहित वस्तुयें) प्रमाणित होती हैं। इस प्रकार अस्तित्व में सम्पूर्ण स्थिति, गति, कार्य और प्रयोजन

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