को मानव परम्परा में प्रमाणित होना आवश्यक है। नियति सहज रूप में नित्य सहज और समीचीन है।

मानवीयता पूर्ण परम्परा में जब कभी भी अस्वीकृतियाँ व्यक्त करने की स्थितियाँ बनती हैं जैसे - रोग एक अस्वीकृति है इसे शिष्टता-पूर्ण पद्धति से जब व्यक्त किया जाता है तब उसके निराकरण के उपायों की गुरुता संप्रेषित हो जाती है। इस प्रकार से संकोच, जागृति परम्परा में उपयोगी सिद्ध होता है। जिसका प्रयोजन विरोध का विजय होने में सार्थक होता है।

दूसरी विधि से यह भी सोचा जाता है कि मानवीयता-पूर्ण पद्धति में जीने की कला के रूप में यात्रा करना, सोना, खाना, पहनना-ओढ़ना यह सब मानव करेगा ही करेगा। ऐसा किया जाने वाले क्रियाकलापों में कभी कभी अस्वीकृतियों को व्यक्त करने की स्थिति उत्पन्न होना संभव है - जैसा खाना खाना ही है और खाने की इच्छा समाप्त होने के बाद खाने की प्रक्रिया में अथवा उसकी निरंतरता में अस्वीकृति होना सहज है।

ऐसी स्थितियों में ऐसी अस्वीकृतियों को शिष्टता से प्रस्तुत करना अस्वीकृति से इंगित अर्थ और उसकी औचित्यता सामने व्यक्ति को इंगित हो जाती है। इस प्रकार कई जगहों में उठने, बैठने, चलने, पानी पीने, व्यवसाय कार्य करते समय, व्यवहार करते समय, सेवा करते समय, किसी स्थिति के अनंतर, उस उस समय में किए जाने वाले क्रियाकलापों की अस्वीकृति सामयिक रूप में होना सहज है। उसकी औचित्यता अन्य को बोध होना ही उस औचित्यता का मूल्यांकन सहज आधार है। इस प्रकार शील और संकोच का व्यावहारिक प्रयोजन स्पष्ट है

25. गुरू 26. प्रामाणिक

गुरू :- शिक्षा-संस्कार नियति क्रमानुवषंगीय विधि से जिज्ञासाओं और प्रश्नों को समाधान रूप में अवधारणा में प्रस्थापित करने वाला मानव गुरू है। जागृति क्रम में मानव को अप्राप्त का प्राप्त, अज्ञात का ज्ञात करने के लिए, होने के लिए विधि नियम, प्रक्रिया सहज समझदारी में पारंगत बनाना ही प्रमाणिकता का प्रमाण है। प्रमाणिकता पूर्ण गुरूजन ही अस्तित्व सहज सहअस्तित्व रूप में अवधारणा को प्रतिस्थापित करा सकता है। अवधारणायें अस्तित्व, विकासक्रम, विकास, जीवन, जीवनी क्रम, जीवन जागृतिक्रम, जीवन जागृति रूप मैं हैं। गुरूजन इन मुद्दों में पारंगत रहेंगे, यह समझदारी है। समझदारी के आधार पर ही मानवीय शिक्षा-संस्कार संपन्न होता रहेगा, संस्कार का तात्पर्य ही अवधारणा है। विद्यार्थियों में स्थापित होने से उसकी निरंतरता का

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