प्रमाण व्यवहार एवं व्यवस्था में प्रमाणित होने से है। फलस्वरूप ही अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी सहज कार्यकलाप हर मानवीय शिक्षा-संस्कार सम्पन्न मानव से चरितार्थ होना पाया जाता है।

प्रामाणिक :- प्रमाणों का धारक-वाहक यथा अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण समुच्चय को प्रयोग, व्यवहार, अनुभव पूर्ण विधि से प्रमाणित करना और प्रमाणों के रूप में जीना।

प्रामाणिकता मानव में जागृति सहज अभिव्यक्ति है। जीवन जागृति पूर्वक मानव प्रामाणिक होता है। प्रामाणिकता प्रत्येक मानव की परम आवश्यकता है। इसलिए गुरू, प्रामाणिकता के रूप में सुस्पष्ट है। शिक्षा संस्कार के केन्द्र में जो व्यक्ति विराजमान होते हैं उनका प्रामाणिक होना व्यवहारिक रूप में वांछनीय है। इस प्रकार गुरू, आचार्य, प्रवक्ताओं की प्रामाणिकता ही मानव परम्परा का त्राण और प्राण है।

प्रामाणिकता का प्रमाणों के रूप में व्यक्त होना मानव सहज है। सम्पूर्ण प्रमाण अनुभव मूलक व अनुभवगामी प्रणाली से स्पष्ट होते हैं। प्रमाणों की अभिव्यक्ति अनुभवमूलक ही होती है क्योंकि सम्पूर्ण प्रमाण प्रयोग, व्यवहार और अनुभव ही हैं। व्यवहार और प्रयोग में जो प्रमाणित होना है वह भी अनुभव साक्ष्य के आधार पर स्पष्ट होता है। यथार्थता, वास्तविकता, सत्यता प्रमाणित होती है, न होना प्रमाण भी नहीं होता। सम्पूर्ण प्रमाण प्रयोजनों के रूप में होना सहज है।

मानव भी अस्तित्व में अविभाज्य है और दृष्टा पद प्रतिष्ठा सम्पन्न है। यही अनुभव क्षमता का प्रमाण है। अनुभव क्षमता ही दृष्टा पद में प्रकाशित है। दृष्टापद विकास व जागृति की महिमा है। जागृति प्रत्येक मानव का अभीष्ट है क्योंकि जागृति पूर्वक ही मानव का निर्भ्रम और सफल होना अस्तित्व सहज है। जागृति ही अनुभव प्रकाश है। मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में प्रकाशित है। जागृति क्रम में मानव अग्रिम जागृति का प्रयास करते आया है। अभी भी प्रामाणिकता पूर्ण पद्धति, प्रणाली, नीति पूर्वक जीने की कला का समृद्ध होना समीचीन है। मानव परम्परा उनकी धारक-वाहक है हर मानव संतान को इसकी आवश्यकता है। यह परम्परा है।

अस्तित्व, विकास, जीवन, जीवन जागृति, रासायनिक-भौतिक रचना-विरचना की यथार्थता, वास्तविकता, सत्यता के फलस्वरूप अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था सर्वसुलभ होती है।

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