अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था ही मानव कुल का प्रमाण और प्रामाणिकता का प्रयोजन है तथा उसकी निरंतरता हो। सार्वभौम व्यवस्था को पहचानने के क्रम में मानव स्वयं ही अखंड समाज समाधान, समृद्धि, अभय तथा सहअस्तित्व के रूप में प्रमाणित होता है।

सार्वभौम व्यवस्था में मानव में न्याय, विनिमय, उत्पादन, स्वास्थ्य-संयम और मानवीय शिक्षा-संस्कार सुलभ होता है। तभी सुखद, सुन्दर, समाधान पूर्ण समृद्ध मानव परम्परा वैभवित होगी। अतएव ऐसी सर्व वांछित घटनाओं को साकार एवं सर्वसुलभ करने के लिए प्रामाणिक परम्परा ही एक मात्र शरण है। प्रामाणिकता पूर्वक ही शिक्षा-संस्कार, संविधान व स्वराज्य व्यवस्थाएं सफल हो पाती हैं। इसीलिए प्रामाणिक परम्परा को पाने के लिए आचार्य, शिक्षक, गुरू, व्यवस्थापक, संविधान एवं शिक्षा की वस्तु का प्रामाणिक होना अनिवार्य है। इसे पाने के लिए अस्तित्व सहज जीवन विद्या एवं वस्तु विद्या का संतुलित अध्ययन, प्रतिभा व व्यक्तित्व के संतुलित उदय का अध्ययन व व्यवहार में सामाजिक तथा व्यवसाय में स्वावलम्बन के संतुलित क्रियान्वयन का अध्ययन प्रामाणिक परम्परा के लिए आवश्यक है। इस प्रकार गुरू का स्वरूप प्रामाणिकता का स्वरूप लोक मानसिकता में स्वीकृत होना पाया जाता है।

27. शिष्य - 28. जिज्ञासु

शिष्य :- जागृति लक्ष्य की पूर्ति के लिए शिक्षा-संस्कार ग्रहण करने, स्वीकार करने के लिए प्रस्तुत व्यक्ति जिसमें गुरू का संबंध स्वीकृत हो चुका रहता है। यही जिज्ञासात्मक शिष्टता है।

जिज्ञासु :- जीवन ज्ञान सहित निर्भ्रम शिक्षा ग्रहण करने के लिए तीव्र इच्छा का प्रकाशन।

समझने, सीखने, करने के लिए पूर्ण जिज्ञासा सहित प्रयत्न संपन्न व्यक्ति शिष्य के रूप में शोभनीय होता है। सफल होने के सभी लक्षणों से युक्त वातावरण में विश्वास होना और विश्वास को वातावरण में प्रभावित करने, प्रमाणित करने की सभी प्रक्रिया अध्ययन है।

अस्तित्व, विकास, जीवन, जीवन जागृति, रासायनिक-भौतिक रचना-विरचना सम्पूर्ण मानव के लिए समझने-समझाने की वस्तु है। सीखने की जो कुछ भी प्रमाणित वस्तु है, यह मानव में मानवीयतापूर्ण आचरण, कर्म अर्थात् व्यवसाय में स्वावलम्बन, व्यवस्था में भागीदारी, मानवीयता पूर्ण आचरण का अभ्यास प्रामाणिकता सहज अभिव्यक्ति है। साथ ही सार्वभौम व्यवस्था और अखंड समाज में निष्ठा है। ये सम्पूर्ण जिज्ञासाएँ व्यावहारिक रूप में चरितार्थ होती

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