हैं। प्रौढ़ता की पराकाष्ठा में, से, के लिए स्वानुशासन की जिज्ञासा का होना पाया जाता है। जिज्ञासा मानव सहज प्रकाशन है।
जिज्ञासा में ही न्यायिक अपेक्षाएँ संयत, नियंत्रित होती हैं। मानव मूलतः सहज रूप में सही कार्य व्यवहार करने का इच्छुक है, न्याय सहज अपेक्षा और सत्य वक्ता है। इस आधार पर जिज्ञासाएँ उद्गमित होते ही रहती हैं। जब तक प्रमाणिकता का स्रोत मानव परम्परा में स्थापित न हो जाए तब तक इसी जिज्ञासा की पुष्टि में कल्पनाशीलता- कर्म स्वतंत्रता पुनर्प्रयास के साथ क्रियान्वित रहते ही हैं। इसे प्रत्येक मानव में देखा जा सकता है। सम्पूर्ण जिज्ञासाएँ अज्ञात को ज्ञात करने, अप्राप्त को प्राप्त करने के क्रम में हैं। कर्मस्वतंत्रता और कल्पनाशीलता जीवन तृप्ति के पक्ष में प्रमाण और स्रोतों को अन्वेषण करने की प्रक्रिया है। यह सदा ही जीवन सहज अभीप्सा है। अभीप्सा का तात्पर्य - अभ्युदय के लिए कल्पना और इच्छाओं को बनाए रखने की क्रिया है।
जीवन तृप्ति का तात्पर्य - स्वराज्य और स्वतंत्रता में प्रमाणित होना है। इसे पाने के पहले इस संदर्भ में सम्पूर्ण अध्ययन संपन्न होने में शिक्षा-संस्कार की प्रमुख भूमिका है। यह अध्ययन भी जिसका एक अनिवार्य भाग है। मानव परम्परा के जागृत होने के उपरान्त ही इसके सबको सुलभ होने की संभावना समीचीन है।
परम्परा जागृत होने का तात्पर्य है - मानवीय शिक्षा संस्कार, मानवीय आचार संहिता रूपी संविधान, परिवार मूलक स्वराज्य रूपी अखंड समाज व्यवस्था और स्वास्थ्य-संयम संबंध में पूर्णतया प्रामाणिकता को व्यवहार में प्रमाणित करना। यही जागृति की सफलता का स्वरूप है। इसीलिए समझदारी सहज शिक्षा की आवश्यकता है। जागृति परम्परा की आवश्यकता इस दशक में बढ़ रही है जो मानवतावादी दृष्टिकोण को विकसित करने के स्वरों के रूप में सुनने को मिलता है। यह सभी राजनैतिक दलों, संस्थाओं और सभी समाज सेवी संस्थाओं के लोक शिक्षण में, धर्म नैतिक संस्थाओं मैं एवं इतना ही नहीं व्यापार केन्द्र संस्थाओं की उदारता पूर्ण विधि को व्यक्त करते हुए (अथवा उदारतावादी विचारों को व्यक्त करते हुए) संवादों के रूप में सुनने को मिला है।
कम से कम इस दशक में मानवतावादी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देने वाली गोष्ठियां सभी स्तरों पर पाई जाती हैं। इसलिए मानव परम्परा जागृत होने की संभावना समीचीन होती है। जागृति के आधार पर मानव संचेतना में सभी समुदाय चेतनाएं विलय होने की संभावना समीचीन हो चुकी है। क्योंकि आदर्शवाद और भौतिकवाद सदूर विगत से अभी तक जो कुछ भी समुदायों