और वर्गों का संघर्ष मतभेद और शक्ति प्रयोग (संघर्ष और सामरिक विधि से) के परिणाम स्वरूप आज की स्थिति में प्रदूषण, बढ़ती हुई जनसंख्या, धरती का तापमान, बढ़ती हुई समुद्र की सतह ये सब प्रधान संकट हैं।
इन संकटों के साये में जीने का रास्ता केवल संघर्ष और युद्ध ही है। इसी मोड़ पर धरती पर जीते-जागते 700 करोड़ से अधिक मानवों को जीने के लिए मजबूर कर दिया है। यह केवल उक्त दो प्रकार की विचार प्रर्वतन योजना कार्य का ही परिणाम है। आदर्शवादी धरती के साथ कम से कम अपराध करते रहे हैं। भले ही मानव के साथ परस्पर परिवार, समुदाय, वर्ग के रूप में संघर्षरत रहे हैं। इसी संघर्ष के साथ जुड़े भौतिकवादी आविष्कारों के सहारे धरती के साथ अपराध करना राज्य स्तर पर स्वीकृत हो चुका है।
पर्यावरण समस्या का मूल तत्व खनिज तेल व कोयला ही है। इसके विकल्प के रूप में सूर्यऊष्मा, प्रवाह बल की उपयोगिता विधि व उसके लोकव्यापीकरण की आवश्यकता है। इसी से जल, थल व वायु प्रदूषण निवारण होना सुस्पष्ट है। बढ़ती हुई जनसंख्या का कारण असुरक्षा भी हैं जोकि मानव में निहित अमानवीयता का भय ही है। प्राकृतिक भय के रूप में भूकम्प, बाढ़, चक्रवात, तुफान ये सब आता ही है। इसी के साथ रोग भी भय का स्रोत है। जहाँतक रोग की बात है रोग को औषधि, उपचार, उपाय के सहारे निराकरण कर लेना सहज है।
भूकम्प और बाढ़ जनित भय का निराकरण बाढ़ की सीमायें व भूकम्प की निश्चित दिशा मानव को पहचानने में आता है उसी के आधार पर इसका निराकरण होता है। जब से धरती के साथ अपराध अर्थात् धरती के भीतर की चीजों का अपहरण करने के लिए या शोषण करने के लिए प्रयत्न किया है तब से धरती की भूकम्प सम्बन्धी दिशायें विचलित हुई हैं। यह भी मानव को पता है। धरती के साथ अपराध बन्द करने पर धरती अपनी निश्चित विधि से ही अपने सौभाग्य को बनाये रखने में सक्षम है। अतएव धरती के साथ अपराध करने की स्वीकृतियों में परिवर्तन करने की आवश्यकता, इसके लिए भरपूर समझदारी की आवश्यकता है।
नासमझीवश ही मानव अपराध करता पाया जाता है। अतएव भयमुक्ति के उपरान्त ही मानव परम्परा में स्वयं स्फुर्त जनसंख्या नियन्त्रण होने की व्यवस्था है। ऐसी व्यवस्था ही परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था है। इस व्यवस्था के अनुसार परम्परा बनने की स्थिति में हर गांव व नगर कितने जनसंख्या के आवास योग्य हैं इसका निर्धारण होता है। इसी विधि से जनसंख्या नियन्त्रण होना समीचीन है।