धरती का तापक्रम बढ़ना परिणामतः समुद्र में जलस्तर बढ़ना। अतः यह सुस्पष्ट है कि धरती में निहित खनिज, तेल एवं कोयला ही ताप पचाने के द्रव्य हैं। अतएव इन द्रव्यों का शोषण न किया जाए तभी संतुलन की स्थिति आना संभव है। चक्रवात व तूफान भी अपने निश्चित दिशा व स्थान में आना पाया जाता है। इससे बचकर मानव सुखपूर्वक पीढ़ी-दर-पीढ़ी धरती पर बने रह सकता है। अतएव शिक्षा की परिपूर्णता मानव परम्परा में प्रमुख मुद्दा है।
जन्म से मानव संतान अनुकरण-अनुसरण करती हुई देखने को मिलती है। यही आज्ञापालन और सहयोग कार्यों में प्रमाणित होने का सूत्र है। परम्परा, जागृति और प्रामाणिकता का सहज धारक-वाहक होने के आधार पर ही परम्परा से अग्रिम पीढ़ी को प्रामाणिकता पूर्ण शिक्षा-संस्कार सुलभ होता है। ऐसी स्थित पाने के लिए जागृति विधि से शिक्षा-संस्कार को स्थापित करना सर्वप्रथम आवश्यकता है। फलस्वरूप मानव संतानों में सहज ही जिज्ञासा उद्गमित होना समीचीन है।
मानव परम्परा में प्रामाणिकता ही प्रधान वैभव है। जागृति ही इसका मूल स्रोत है। इसका धारक-वाहक केवल मानव है। सम्पूर्ण प्रमाणों की अभिव्यक्ति तथा संप्रेषणा का आधार भी केवल मानव है। मानव संतानों में प्रयासोदय शैशव अवस्था में ही देखने को मिलता है। उसी के साथ-साथ आज्ञापालन और सहयोग प्रवृत्ति प्रकारान्तर से सभी मानव संतानों में देखने को मिलती है। इसी के साथ अनुकरण कार्यों में प्रमाणित करने का (अथवा अनुकरित कार्यों को प्रमाणित करने का) सिलसिला दिखाई पड़ता है।
प्रत्येक संतान में पाँचों ज्ञानेन्द्रिय सहज कार्यकलापों को व्यक्त करने की स्वाभाविक क्रियाएँ देखने को मिलती हैं। यह शरीर यात्रा के आरंभ से ही होना स्पष्ट है। प्रत्येक शिशु में स्वस्थता की पहचान परम्परा से ही पाँचों ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों के क्रियाकलाप से ही है। इस प्रकार ज्ञानेन्द्रिय पूर्वक कर्मेन्द्रियों सहित शिक्षा ग्रहण करना भी देखा जा रहा है। इस प्रकार मानव संतानों में कोई ऐसी अड़चन नहीं है कि जिसे परम्परा प्रावधानित करना चाहती है उसे वह ग्रहण न करे। इससे यह पता लगता है कि शिशु काल की अपेक्षा के अनुरूप प्रौढ़ पीढ़ी में समाधान एवं तृप्ति प्रदान करने योग्य वस्तु ही नहीं है।
शैशविक (शिशु) मानसिकता के आधार पर हर शिशु न्याय का याचक (अभिभावकों के भरोसे पर) सही कार्य व्यवहार करने का इच्छुक (अनुसरण और अनुकरण के आधार पर) और सत्य वक्ता होता है (सुने देखे के आधार पर) इसी से मानव संतान को क्या चाहिए पीछे पीढ़ी से यह स्पष्ट हो जाता है कि :-