(1) न्याय प्रदायी क्षमता योग्यता को स्थापित करने की विधि से न्यायापेक्षा की तृप्ति होना पाया जाता है।
(2) सही कार्य व्यवहार को करने की इच्छा की तृप्ति, व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलम्बन की क्षमता, योग्यता, पात्रता को स्थापित करने के आधार पर संपन्न होता है।
(3) सत्यवक्ता होने की तृप्ति अस्तित्व सहअस्तित्व रूपी सत्य बोध से होती है। अस्तित्व दर्शन से सत्य बोध, जीवन ज्ञान से व्यवहार में सामाजिक एवं व्यवसाय में स्वावलम्बन तथा मानवीयता पूर्ण आचरण में पारंगत होने से न्याय प्रदायी क्षमता प्रमाणित होती है।
29. भाई-मित्र 30. प्रगति
प्रगति :- 1. मानवत्व रूपी आचरण सहज व्यवस्था व समग्र व्यवस्था अर्थात् परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में भागीदारी। 2. समाधान प्रधान समृद्धि सहज अपेक्षा प्रक्रिया और प्रमाण।
भाई :- एकोदर (एक उदर = पेट से पैदा होने वाले) को भाई का संबोधन है।
मित्र :- सहोदरवत् (सगे भाई जैसा ) जो होते हैं उन्हें भाई व मित्र संबंध का सम्बोधन है।
भाई व मित्र संबंध में शुभकामनाएँ स्वयं स्फूर्त होना सहज है। जब मानवीयता पूर्ण परंपराएँ हों तब संविधान, स्वराज्य व्यवस्था का आविभाज्य वर्तमान है। मानवीयता मानव का स्वत्व होने के कारण सहज अभिव्यक्ति होती है। भाई और मित्र के रूप में एक दूसरे का शुभ चाहते ही हैं
मानव जीवन सहज रूप में, पहचान में आने वाले मित्र व भाई का संबंध व इसकी पहचान समाधान, समृद्धि के अर्थ में स्पष्ट होता है। सभी पहचान उद्देश्य सहित होना पाया जाता है। अथवा सभी पहचान किसी उपयोगिता, सदुपयोगिता, प्रयोजनीयता के अर्थ में सार्थक होता है। फलतः वही स्वयं लक्ष्य होते हैं। परस्पर प्रयोजन सदुपयोग व उपयोगिता में नियम, नियंत्रण, संतुलन, न्याय, समाधान प्रामाणिकता और समृद्धि के अर्थ में नित्य सार्थक हैं।
मानव की परस्परता में नियंत्रण सहित नियमों का पालन किया जाता है। मानव स्वभाव गति रूप में नियंत्रित रहता है। मानव की स्वभाव गति मानवता ही नियंत्रण है। यह नियंत्रण व नियम के रूप में प्रमाणित होता है। संबंधों की पहचान मूल्यों का निर्वाह करने।
(1) जागृत मानव स्वयं व्यवस्था एवं समग्र व्यवस्था में भागीदारी में प्रवर्तन रूपी शुभ के अर्थ में कार्यरत रहता है।