(2) परस्परता में उपयोगिता, सदुपयोगिता, प्रयोजनीयता के प्रति वर्तमान में विश्वास होता है।

(3) जीवन जागृतिकारी जीवन विद्या से सम्पन्नता। तन-मन-धन का सदुपयोग, सुरक्षा रूपी उदारता वर्तमान में प्रमाणित होता है। यथार्थताओं की पहचान व निर्वाह करने के रूप में (धीरतारूपी) मूल्य व मूल्यांकन होता है।

(4) पूरकता विधि पूर्ण, आचरण कार्य सहित धीरता, वीरता, उदारता रूपी वास्तविकता पर आधारित व्यवहार होता है। सहअस्तित्व सहज नियति रूपी नियम, नियंत्रण, संतुलन व न्याय पालन से सत्यता सहज मानवीयता पूर्ण आचरण व्यवहार व्यवस्था में प्रमाणित होता है। इसी विधि से स्वतंत्रता, स्वराज्य मानव कुल में प्रमाणित होता है। पीढ़ी से पीढ़ी के लिए यही नित्य स्रोत होना पाया जाता है। समझदारी पुर्वक भाई-मित्र सम्बंधों सहित सार्वभौम व्यवस्था में जीने के लिये तत्पर होना समीचीन है। साथ ही स्वयं की उपयोगिता, सदुपयोगिता व प्रयोजनों का पहचान, मूल्यांकन और निर्वाह रूपी पूरकताएं दयापूर्ण कार्य व्यवहार से प्रमाणित होना सहज है।

मानवीयता पूर्ण प्रवर्तन कार्य

अमानवीयता पूर्ण प्रवर्तन कार्य

(1)

शुभकामना सन्तुलन प्रवृत्ति व कार्य

कामावेश भोग प्रवृत्ति व क्रिया

(2)

स्नेह विश्वास सहअस्तित्व प्रवृत्ति व कार्य

क्रोधावेश हिंसक प्रवृत्ति व क्रिया

(3)

उदारता दायित्व कर्तव्य में अर्पण- समर्पण

लोभावेश संग्रह प्रवृत्ति व क्रिया

(4)

मूल्य व मूल्यांकन कर्तव्य दायित्व का निर्वाह

मोहावेश अव्याप्ति दोष, प्रवृत्ति व कार्य

(5)

नियम पालन बौद्धिक, सामाजिक, प्राकृतिक प्रक्रिया व कार्य

मदावेश स्वयं के प्रति अधिमूल्यन

(6)

पूरकता व दयापूर्ण कार्य व्यवहार, विन्यास, जागृति पूर्वक तन, मन, धन का नियोजन सभी संबंधों में।

मात्सर्य आवेश अवमूल्यन प्रवृत्ति व कार्य

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