रूप की सार्थकता सच्चरित्रता के रूप में (अर्थात् स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष, दया पूर्ण कार्य व्यवहार के रूप) में होती है।
बल की सार्थकता दया पूर्वक होती है। इस रूप में दया का सफल होना सहज है। यह संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह क्रम में किया गया सम्पूर्ण अर्पण-समर्पण है।
धन की सार्थकता को उदारता के रूप में पहचाना जाता है। उदारता आय के अनुपात में व्यय, व्यय के अनुपात में आय के रूप में स्पष्ट है। तन, मन, धन का सदुपयोग ही सहज उदारता है।
पद की सार्थकता न्याय सुलभता के रूप में सफल है। मानव संबंध, नैसर्गिक संबंध, श्रम संबंधों को पहचानना और मूल्यों का निर्वाह करना सम्पूर्ण क्रियाकलाप हैं।
बुद्धि की सार्थकता विवेक (प्रयोजन व सार्थकता) रूप में सफल है। सम्पूर्ण प्रयोजन व सार्थकता क्रम से ज्ञान विज्ञान सम्मत निर्णय विवेक होना सहज है। जो समाधान क्रम है। इसी क्रम में सर्वतोमुखी समाधान समीचीन है। सर्वतोमुखी समाधान का तात्पर्य है - आचरण, व्यवहार, व्यवस्था कार्यों में मानवीयता आचरित होना है।
33. स्वीकृति 34. स्वागत
स्वीकृति :- अनुभव मूलक प्रभाव में इंगित होने वाले सम्पूर्ण संकेतों को यथावत परावर्तन में और प्रत्यावर्तन में प्रमाणित करने की क्रिया।
अनुभव सदा-सदा आत्मा में होता ही है जिसमें यर्थाथता, वास्तविकता, सत्यता सहअस्तित्व में प्रमाणित होने योग्य विधि से यथा बुद्धि, चित्त, वृत्ति, मन में प्रभावित रहना पाया जाता है। इसी क्रम में सभी यर्थाथ संकेत मन में इंगित होना स्वभाविक है। यही पूर्वानुक्रम संकेत है। इन संकेतों को यथावत अर्थात् जैसा संकेत मिला उसे वैसे ही मानव परम्परा में प्रमाणित करने की प्रवृत्ति न्याय, धर्म, सत्य सम्पन्न विधि से मन परावर्तित रहता ही है।
स्वागत :- (1) अवधारणा, अनुभव के लिए स्वीकृत किया। (2) नियम, न्याय, समाधान, सत्य सहज स्वीकृतियों, अस्वीकृतियों के लिए तैयारियाँ। (विवेक व विज्ञान सम्मत मानसिक, वैचारिक और ऐच्छिक तैयारियाँ)
इंद्रिय सन्निकर्ष में भी स्वागत भाव का भास आभास होना पाया जाता है जिसकी निरंतरता की अपेक्षा बनी ही रहती है। यह व्यवहार में प्रमाणित नहीं हो पाता। अतएव स्वागत का आधार