सम्पूर्ण मूल्य अनुभव होना पाया जाता है। मूल्यों का धारक-वाहक जीवन ही होता है। इसलिए मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि, आत्मा के अविभाज्य जागृति के रूप में ही जीवन सामरस्यता क्रम में आस्वादन विधि को सम्पन्न करता है।

यह क्रम सहअस्तित्व सहज अस्तित्व में अनुभव व बोध विधि से ही संभव हो पाता है। शरीर को सत्य समझकर (शरीर केन्द्रित) आस्वादन करने की स्थिति में जीवन तृप्ति का स्रोत नहीं बन पाता। अतएव जीवन तृप्ति विधि से ही आस्वादन सार्थक होता है अर्थात् जीवन में, से, के लिए जीवन समझ में आने के बाद ही आस्वादन की सार्थकता, नियम और न्याय के रूप में निरंतर ही सुख, सुन्दर, समाधान के प्रमाणों सहित है।

स्वीकृति और स्वागत क्रियाकलाप जीवन सहज क्रिया ही है। शरीर भी जीवन्तता पूर्वक जीवन के अर्थ को व्यक्त करने में एक माध्यम है। अतएव मानव परम्परा जीवन और शरीर के संयुक्त साकार रूप में वैभवित रहता है। यह तथ्य पहले से ही स्पष्ट किया जा चुका है। अतः जीवन सहज मन में स्वीकृति पूर्वक आस्वादन और स्वागत क्रियाकलापों को सम्पन्न करता है।

स्वीकृति और स्वागत क्रिया जीवन सहज स्वभाव गति प्रतिष्ठा में है। इसे जागृति सहज मौलिकता के रूप में मानव परम्परा में स्पष्ट करता है। मूलतः जीवन धर्म सुख-शांति-संतोष-आनंद सहज प्रमाण नियम, न्याय, समाधान, सत्य ही हैं। ये जीवन सहज स्वीकारने योग्य क्रियाएँ हैं। स्वीकृत क्रियाएँ, सहज रूप में ही स्वागत सहज प्रमाण होती हैं अथवा स्वीकृति के लिए क्रियाकलापों को शिक्षा-संस्कार के रूप में सम्पन्न किया जाता है। इसलिए जागृति परम्परा में स्वागत क्रिया दो विधियों से कार्यरत होती है - परावर्तन व प्रत्यावर्तन।

मानवीयतापूर्ण परम्परा में ही प्रत्येक मानव संतान के लिए जागृति का स्रोत है। मानव परम्परा भी अस्तित्व में अविभाज्य कार्यकलाप है।

मूलतः स्वीकृतियों को अवधारणा के रूप में स्थापित होना पाया जाता है। ऐसी सभी अवधारणाएँ अनुभव मूलक विधि से प्रमाण पूत (पवित्र प्रमाण) होते हुए व्यवहार में प्रमाणित होती हैं। अतएव सम्पूर्ण कार्यकलापों को अवधारणा के अर्थ में ही (सम्पूर्ण क्रियाकलाप का तात्पर्य पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से) सम्प्राप्त होने वाले (पूर्णता के अर्थ में प्राप्त होने वाले ) सूत्रों के रूप में देखा जाता है। संवेदनापूर्वक सम्पूर्ण सूत्र और व्याख्या अपने अर्थ में अस्तित्व सहज मानव केन्द्रित रूप में

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