सूत्रित है। यही मानव परम्परा में शरीर यात्रा सहज स्वीकृति और स्वागत क्रिया की सार्थकता है। यही सम्पूर्ण अध्ययन भी है।
सम्पूर्ण अवधारणाएँ मौलिकता के रूप में होना पाई जाती है। मौलिकताएँ धर्म और स्वभाव के ही सूत्र हैं। सम्पूर्ण अस्तित्व में प्रत्येक एक अपने “त्व” सहित व्यवस्था है एवं समग्र व्यवस्था में भागीदार है क्योंकि अस्तित्व में सम्पूर्ण इकाईयाँ सहअस्तित्व सूत्र में सूत्रित हैं। इसी क्रम में मानव जागृति पूर्वक (अर्थात् जानने-मानने,पहचानने-निर्वाह करने के संगीत क्रम में) अस्तित्व में चार अवस्थाओं में से “त्व” सहित व्यवस्था को पहचानने के क्रम में है। जैसे पदार्थावस्था में-
(1) लोहत्व से लोहा, स्वर्णत्व से स्वर्ण, मणित्व से मणियाँ, मृदात्व से मिट्टी, पाषाणत्व से पाषाण (पत्थर) आदि को पहचाना जाता है। मानव मूल्यांकन करता है।
(2) दूबत्व से दूब, आमत्व से आम, नीमत्व से नीम, सालित्व से धान, बिल्वत्व से बेल, गोधोमत्व से गेंहू आदि को प्राणावस्था में उन-उन के “त्व” सहित व्यवस्था से पहचाना जाता है। मौलिकताएँ मूलतः मूल्य ही है।
(3) जीवावस्था में गौत्व से गाय, व्याध्रत्व से व्याध्र (शेर), मार्जारत्व से मार्जार (बिल्ली); श्वानत्व से श्वान, सर्पत्व से सर्प, मेषत्व से बकरी आदि जीवों को उन-उन के “त्व” सहित व्यवस्था कार्य में पहचाना जाता है।
(4) ज्ञानावस्था में मानव अपने ‘त्व’ सहित व्यवस्था है। व्यवस्था में भागीदारी सहित “मानवत्व” का प्रमाण प्रस्तुत करना अभी भी परम्परा रूप में साक्षित होने की प्रतीक्षा बनी हुई है। सम्पूर्ण मानवत्व का सूत्र नियम, न्याय, समाधान (धर्म) और सत्य ही है। नियम प्राकृतिक, सामाजिक और बौद्धिक नियमों के रूप में अध्ययनगम्य है। न्याय के रूप में ही मानव - परम्परा में संबंध, मूल्य, मूल्यांकन की सामरस्यता के आधार पर मानव प्रमाणित होता है।
इसे प्रत्येक मानव-व्यवहार में प्रमाणित करना संभव है। सम्पूर्ण बौद्धिकता को ही व्यवहार में प्रमाणित करना है, प्रमाणित होना है। जीवन अपनी जागृति के आधार पर प्रत्येक मानव में बौद्धिकता के अर्थ में प्रमाणित होता है। जीवन में ही बुद्धि का वैभव है न कि शरीर में। जीवन मानव-परम्परा में प्रमाणित होने के लिए शरीर एक माध्यम है। जीवन सहज जागृति शरीर की स्वस्थता के योगफल में मानव परम्परा का ही स्वस्थ होना, व्यवस्थित होना पाया जाता है।