पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था में भी उन-उन की परम्परा के आधार पर भी जातियों का नामकरण किया गया है, जबकि मानव जाति, मानव धर्म (सर्वतोमुखी समाधान) के आधार पर “जाति एक, कर्म अनेक हैं।” चूंकि मानव बहु आयामी अभिव्यक्ति है इस कारण कर्म अनेक होना स्वाभाविक है। सम्पूर्ण प्रकार के कर्म नियमों के प्रमाण में सहअस्तित्व को, सहअस्तित्व सहजता को, न्याय सहज प्रमाण में सहअस्तित्व को, धर्म (समाधान) सहज विधि से स्वयं व्यवस्था एवं समग्र व्यवस्था में भागीदारी को और सत्य सहज विधि से प्रमाण और प्रामाणिकता को मानव परम्परा में प्रमाणित करना ही मानव परम्परा का वैभव है। अभिप्राय यही है कि अभ्युदय के अर्थ में मानव, बहु आयामी कार्यकलापों को सम्पन्न करता ही है। मानव तृप्ति, समाधान, समृद्धि, अभय (वर्तमान में विश्वास); सहअस्तित्व सामरस्यता सहज समाज न्याय सहित उत्सवित होता है, उत्सवित करता है, उत्सव के लिए निरंतर स्रोत बने रहता है यही मानव परम्परा का अद्भुत वैभव है। ज्ञानावस्था सहज महिमा है। जीव कोटि के वैभवों से सर्वथा भिन्न और मौलिक (धर्म और पहचानने योग्य) वैभव यही है। ऐसे वैभव को प्रत्येक व्यक्ति स्वागत करने के लिए सहज रूप में आकांक्षित है।

35. रुचि 36. पहचान

पहचान :- 1. इन्द्रिय सन्निकर्ष में चरितार्थता आवश्यक अथवा अनिवार्य तत्व। 2. वस्तुओं का योग संयोग से प्राप्त फल परिणाम की भी स्वीकृति।

रुचि :- रासायनिक द्रव्यों से रचित रचनात्मक व्यवस्था में अनुकूल भौतिक रासायनिक वस्तुओं के संयोग से योग में (मिलने से) प्राप्त परिणामों की पहचान।

जैसा जीभ एक शरीर से अभिन्न अवयव के रूप में भौतिक रासायनिक वस्तुओं से रचि रचना है। इसके संयोग में आने वाली वस्तु भी भौतिक अथवा रासायनिक होती है। इसका फल परिणाम में ही रूचि की पहचान मन में होना पाया जाता है क्योंकि यह भी एक ज्ञानेन्द्रि है।

जीवन सहज विधि से सोचने-समझने कार्य व्यवहार करने और व्यवस्था सहज कार्यकलापों को प्रमाणित करने, प्रामाणिकता पूर्वक जीने की अभिलाषा का सर्व मानव में होना पाया जाता है। आदि काल से मानव परम्परा सर्व शुभ कामना करते ही आई। ऐसी कामनाओं को साकार करने के लिए विविध प्रयास भी हुए। इसके उपरान्त भी व्यवहार में समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व रूपी सर्व शुभ को चाहते हुए भी यह वर्तमान में घटित नहीं हुआ। इसीलिए पुनर्प्रयास

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