की आवश्यकता रही। इसी क्रम में “मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान” इस पावन उद्देश्य को सफल बनाने के लिए अर्पित है।
रुचियों की पहचान :-
(1) इंद्रियों के आधार पर संवेदनाओं के रूप में।
(2) जागृत मानव में नियम, न्याय, समाधान के आधार पर होती है। जीवन और शरीर की स्पष्ट पहचान के उपरान्त ही नियम, न्याय, समाधान, सहज रस, सुख, सौंदर्य में अभिभूत होना पाया जाता है। अभिभूत होने का तात्पर्य नियम, न्याय, समाधान को जीवन सहज रूप में पहचानने-निर्वाह करने मूल्यांकन करने व उभय तृप्ति पाने से है अथवा जीवन सहज वैभव होने के रूप में पहचानने से है। इसी क्रम में मानव का प्रयोजन यथा व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी का प्रयोजन प्रमाण पूरा पूरा समझ में आता है। इसी क्रम में नियम रूपी सुख; न्याय रूपी सौंदर्य; व्यवस्था रूपी समाधान मानव परम्परा में प्रत्येक व्यक्ति के लिए सहज समीचीन है। इसका सार्थक होना मानव संचेतनावादी मानसिकता से सहज संभव है।
इंद्रिय सन्निकर्षों के आधार पर शरीर को जीवन मानते हुए स्वीकार किया गया। रूचियाँ इन्हीं इन्द्रियों द्वारा रूचि ग्राही होने के रूप में भ्रमितमन मान लेने से भी क्षणिक रूप में सुख भासना देखा गया है। शरीर संवेदनाओं के आधार पर सम्पूर्ण प्रकार की रूचियों को भंगुरात्मक (क्षण-भंगुर) ही पाया गया। इनकी स्मृतियों में विवश होते हुए मानव ने बारम्बार ऐसे प्रयासों में भ्रम में मग्न रहकर इसे ही सुख का एक मात्र मार्ग है- ऐसा मानते हुए अधिकांश लोगों ने चलकर देख लिया। निष्कर्ष यही निकला कि ऐसी प्रवृत्तियों के आधार पर कोई :-
(1) व्यवस्था सूत्र से सूत्रित नहीं हुआ।
(2) सार्वभौम समाज न्याय को पहचानना संभव नहीं हुआ।
(3) सर्व समृद्धि का कोई मार्ग प्रशस्त नहीं हो पाया।
इस प्रकार मानव की अभीप्साएँ अभी भी प्रतीक्षा में ही हैं। मानव सहज अभीप्सा समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व है। इसको प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में और समग्र मानव में निरीक्षण-परीक्षण और सर्वेक्षण पूर्वक स्वीकार के अर्थ में प्रमाणित कर भी सकता है, करा भी सकता है, करने के लिए प्रेरणा भी दे सकता है। इस विधि से यह स्पष्ट हो जाता है कि मानवाकाँक्षा सदा दर किनार रही हैं। कुछ लोगों ने आकाँक्षायें धन, पद, नाम फैलाने के ढंग से राज धर्म, शिक्षा