(1) ईश्वर रूपी सदग्रन्थों में।

(1) दूरश्रवण, दूरदर्शन, दूरगमन, के लिए यंत्र उपकरण।

(2) पावन ग्रन्थों पर आधारित विचार शैलियों में।

(2) घरेलू एवं कृषि प्रौद्योगिकी यंत्र उपकरण।

(3) ऐसे विचार शैलियों पर आधारितशास्त्रों में।

(4) शास्त्रों पर आधारित समुदाय मानसिकता में।

(5) समुदाय मानसिकता के आधार पर जीवन की शैली में मतभेद दृष्टव्य है।

इन दोनों सविरोधी विचारों की स्वीकृत प्रवृत्तियाँ (पाँच)

विरक्ति, भक्तिवादी

(प्रयास प्रवृत्ति)

लाभोन्मादी, भोगोन्मादी, कामोन्मादी

(संघर्ष कर्म प्रवृत्ति)

इस प्रकार कुछ लोगों की आकाँक्षाएं प्रभावशील रही हैं। इन्हीं प्रभावों के आधार पर और इनमें विविधता के आधार पर अनेक समुदायों में मानव दिखाई पड़ता है, इसलिए पुनर्विचार करना आवश्यक हुआ। पुनर्विचार का व्यावहारिक आधार मानव सहज आकाँक्षा है। यह अस्तित्व सहज रूप में ही समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व है। प्रत्येक मानव में सुख, सौंदर्य, समाधान सामाजिकता की अपेक्षा भी देखने को मिलती है। सौंदर्य, न्याय और समाधान का समीकरण है। नियमों के साथ न्याय का वैभव समझ में आता है। नियम अस्तित्व सहज सहअस्तित्व में सूत्रित, व्याख्यायित है। अस्तित्व में अविभाज्य दृष्टा सहज इकाई मानव है। इसका साक्ष्य जानने-मानने, पहचानने-निर्वाह करने की अहर्ता है।

यह प्रत्येक व्यक्ति में प्रमाणित होना ही जागृति है। इस तथ्य को प्रत्येक व्यक्ति में सर्वेक्षित किया जा सकता है क्योंकि प्रत्येक मानव संतान जन्म से ही न्याय का याचक, सही कार्य व्यवहार

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