करने का इच्छुक और सत्य-वक्ता होता है। इसकी तृप्ति के लिए क्रमशः नियम पूर्ण व्यवसाय से समृद्धि, न्याय पूर्ण व्यवहार से अभय, मानव धर्म (समाधान) पूर्ण व्यवस्था से सर्वतोमुखी समाधान है तथा अस्तित्व रूपी परम सत्य-बोध सहज सहअस्तित्व में, से, के लिए सम्पूर्ण तृप्तियां मानव सहज रूप में, दृष्टा पद प्रतिष्ठावश, नित्य समीचीन है।
मानव दृष्टा पद में सुनिश्चित अभिव्यक्ति है। इस साक्ष्य में वह जीवों का द्रष्टा है ही। जीवों को पहचानना सर्वाधिक मानवों से संभव हो चुका है। इसी प्रकार प्राणावस्था, पदार्थावस्था में वस्तुओं को पहचानना प्रमाणित हो चुका है। मानव द्वारा मानव को पहचानना ही अथक प्रयासों के उपरान्त भी प्रतीक्षित ही रहा है।
ऐसे पहचान के क्रम में मानव संचेतना को उसके कार्य, प्रयोजन, संभावनाओं को, आवश्यकताओं के तारतम्य में अध्ययन करना एक जरुरत रही है। इस विधि से प्रत्येक मानव का स्वयं में संचेतना को पहचानना संभव हो जाता है। संचेतना का सम्पूर्ण रूप जानना-मानना, पहचानना-निर्वाह करना ही है। द्रष्टा पद का यही साक्ष्य है। ऐसे गुण सबमें विद्यमान हैं।
अस्तित्व के संदर्भ में मानव सहज रूप में ही अध्ययन करने के लिये प्रवर्तनशील है। मानव अपने में निरीक्षण-परीक्षण करता है तब पता चलता है कि -
(1) प्रत्येक व्यक्ति कल्पनाशील और कर्म-स्वतंत्र है।
(2) प्रत्येक व्यक्ति कर्म करने में स्वतंत्र, फल भोगते समय परतंत्र है। इनमें फलरूपता को पाना ही जागृति है जैसे कार्य व्यवहार के अनुरूप फल व फल के अनुरूप कार्य व्यवहार।
(3) मानव शरीर यात्रा के आरंभ से ही न्याय का याचक, सही कार्य व्यवहार करने का इच्छुक और सत्य वक्ता होता है।
(4) मानव मनाकार को साकार करने वाला, मनः स्वस्थता का आशावादी है।
(5) मानव, समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व को वरता है।
ये सभी यथार्थ इन बिंदुओं से इंगित होते हैं और उसका प्रयोजन सर्व सुलभ होने का आधार जागृति पूर्ण मानव परम्परा ही है। जागृति परम्परा सहज विधि से प्राप्त जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण पूर्वक किया गया कायिक, वाचिक, मानसिक कृत कारित अनुमोदित क्रियाकलापों से समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व, व्यवहार में प्रमाणित होता