है तथा नियम, न्याय, समाधान, तथा प्रामाणिकता पूर्ण मानसिकता से नित्य उत्सव होता है। फलतः सार्वभौम व्यवस्था, अखंड समाज की परिकल्पनाएँ आचरण पूर्वक प्रमाणित होती हैं। इसी विधि से सम्पूर्ण पहचान और मूल्यों में रूचि सार्थक होना पाया जाता है।

37. सुख 38. स्फूर्ति

सुख :- समाधान।

स्फूर्ति :- समाधान सहज प्रमाण में, से, के लिये नित्य प्रवृत्ति = कायिक, वाचिक, मानसिक रूप में वह कृत कारित, अनुमोदित रूप में व्यवस्था में प्रमाणित करने के लिये तत्परता, जीवन जागृति को परावर्तित करने का उत्सव जागृत जीवन सहज सुख और प्रमाणित करने की स्फूर्ति सहज रूप में होना पाया गया है। सुख को प्रमाणित करने के लिए जो स्फूर्तियाँ जागृत मानव में पायी जाती है यह प्रमाणित होने के क्रम में ही क्रियान्वयन होना पाया गया है।

मूलतः जीवन सहज समझदारी का प्रमाणीकरण करने के क्रम में ही सुख और स्फूर्ति ही सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी, अखण्ड समाज में भागीदारी, परिवार में भागीदारी, स्वयं में विश्वास, श्रेष्ठता का सम्मान, व्यक्तित्व और प्रतिभा में संतुलन, व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलम्बन का प्रमाण ही वर्तमान में किए जाने वाले अभिव्यक्ति, सम्प्रेषणा और प्रकाशन है।

हर मानव वर्तमान में प्रकाशित, संप्रेषित अथवा अभिव्यक्त रहता ही है। प्रत्येक वस्तु प्रकाशित रहता ही है। मानव में ही सर्वाधिक संप्रेषणा और मौलिक जीवन सहज अभिव्यक्ति, विचार सहज संप्रेषणा, कार्य व्यवहार एवं व्यवस्था में भागीदारी के रूप में जागृत मानव परम्परा का वैभव है। जीवन सहज तथ्यों व सहअस्तित्व सहज तथ्यों को स्पष्ट कर देना ही अभिव्यक्ति है। जीवन स्पष्टता के मूल में जीवन नित्य वस्तु के रूप में प्रतिपादित होना पाया जाता है क्योंकि जीवन का मूल रूप गठनपूर्ण परमाणु होना समझा गया है।

जीवन में ही आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रामाणिकता रूपी अक्षय शक्तियाँ जागृत मानव में प्रमाणित होता है। इसे प्रमाणित कर लिया गया है। इसी के साथ यह भी स्पष्ट रूप में प्रमाणित होता है कि मन वृत्ति, चित्त, बुद्धि और आत्मा रूपी अक्षय बल होना पाया गया है। इन्हीं जागृत जीवन सहज अक्षय बल एवं अक्षय शक्तियों की अभिव्यक्ति संप्रेषणा प्रकाशन अनुभव मूलक विधि से होने के तथ्यों को “मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान” के रूप में प्रस्तुत

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