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-4 मूल अवधारणाएँ -2 प्राक्कथन 1 1. समाधान और द्वन्द्व-1 7 2. मानव स्वरूप का इतिहास 22 3. समाधानात्मक भौतिकवाद 24 4. अस्तित्व एवं अस्तित्व में परमाणु का विकास 38 5. अस्तित्व में परमाणु का विकास 54 ज्ञानावस्था में पाँच मानव Subsection 55 प्रकृति सहज चार अवस्थाएं (परस्पर पूरक) Subsection 56 अस्तित्व में व्यवस्था = सहअस्तित्व Subsection 57 6. सहअस्तित्व पूरकता और व्यवस्था 94 7. संचेतना, चेतना और चैतन्य 99 8. समाज, धर्म (व्यवस्था) और राज्य 110 9. समाधानात्मक भौतिकवाद के नज़रिए में : 110 1) मौलिकता की पहचान ही निर्वाह का आधार Subsection 123 2) मानवीय आहार Subsection 134 3) मानव की मौलिकता Subsection 138 4) धर्म और राज्य में अर्न्तसंबंध Subsection 147 5) मानव की पहचान, महापुरुषों की पहचान Subsection 154 6) प्रकाशन और प्रतिबिम्ब Subsection 158 7) गुण, प्रभाव व बल Subsection 164 8) कृत्रिमता, प्रकृति और सृजनशीलता Subsection 171 9) संकरीकरण और परंपरा Subsection 177 10) उद्योग, आवश्यकता, संबंध और संतुलन Subsection 199 11) भय, प्रलोभन या मूल्य और मूल्याकंन Subsection 210 12) भौतिकता, अभिव्यक्ति, संस्कार और व्यवस्था Subsection

स्वभाव होती हैं। प्रत्येक इकाई में जैसा पहले कहा गया-गाय, घोड़ा आदि में उन के स्वभाव को कम से कम उन-उन रचनाओं को शरीर आयु पर्यन्त स्थिर रखने के क्रम में ही वंशानुषंगीयता स्पष्ट होती गयी। यह एक विलक्षण स्थिति सम्मुख होती है कि इस धरती पर मानव के अतिरिक्त सभी रचनाओं (अवस्थाओं) यथा पदार्थावस्था, प्राणावस्था एवं जीवावस्था में देखने पर पता चलता है कि लोहा जब तक रहता है तब तक उसके त्व में अर्थात् लौहत्व में वैपरीत्यता नहीं होती। उसी भाँति आम, बाघ, भालू, गाय आदि में भी वैविध्यता नहीं होती। जबकि मानव को देखें तो पता चलता है कि इसके विपरीत अर्थात् मानवत्व के विपरीत स्थिति में अधिकतम व्यक्ति प्रकाशित है। तात्पर्य यह कि मानव ही इस धरती पर ऐसी एक इकाई है जो मानवत्व के विपरीत कार्य, व्यवहार-विन्यास करते हुए भी अपने को श्रेष्ठ और विकसित होने का दावा करता है। जैसे अधिकतम शोषण एवं युद्घ में समर्थ व्यक्ति, परिवार, समाज अथवा राष्ट्र को विकसित समझा जा रहा है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि मानव अपने त्व को वंशानुषंगीयता में खोजने के अरण्य में भटक गया है या मिटने की तैयारी में आ गया है। मानव का वर्चस्व वंशानुषंगीयता में उज्जवल एवं अनुकरण होने की व्यवस्था होती तब क्या होता? या तो वंशानुषंगीयता के समर्थक कहलाने वालों के अनुसार मानव के पूर्वज जैसे बन्दर थे वे मानव क्यों बन गये? बदल क्यों गये? या तो बदलना को विकास समझ लें। इसी प्रकार, पूर्व पीढ़ी का ज्ञान दूसरी पीढ़ी को बिना समझे व सीखे क्यों नहीं आता? यह उन मनीषियों के लिए विचार करने का एक मुद्दा है।

पदार्थावस्था परिणामकारिता के साथ अथवा परिणाम बीज के रूप में देखी जाती है क्योंकि पदार्थ में मात्रात्मक परिवर्तन के बिना गुणात्मक परिवर्तन नहीं होता और पदार्थावस्था में जो कुछ भी तात्विक परिवर्तन है, वह सब किसी न किसी पद के अर्थ को स्पष्ट करता है । ऐसा प्रत्येक पद विकास के क्रम में कड़ी के रूप में दृष्टव्य है यह कड़ी स्वयं ही विकास का साक्ष्य है। इस प्रकार पदार्थावस्था में जितनी भी संख्या में तात्विक रूप की व्यवहारिक व्यवस्था है, वह स्वयं में स्थिर और निश्चित है। जब वह पदार्थ प्राणावस्था में होता है उसे हम विकास की संज्ञा भाषा रूप में देते हैं। अपेक्षाकृत अर्थात् पदार्थावस्था की अपेक्षा में प्राण कोशिकाओं की जाति प्रजाति कम होने से हैं। दूसरी, परिणामानुषंगीय बीजानुषंगीयता में गण्य हो जाती हैं। पदार्थावस्था में से प्राणावस्था अपनी मौलिकता सहित वैभवित होने के पश्चात् पुन: पदार्थावस्था में परिवर्तित होने की व्यवस्था है।

इसी कारणवश प्राणावस्था, पदार्थावस्था की अपेक्षा विकसित हुई सी दिखते हुए भी पदार्थावस्था की अपेक्षा में उसकी स्थिरता और निश्चयता घट जाती है, जबकि संक्रमित विकास यदि होता तो पदार्थावस्था से प्राणावस्था में स्थिरता और निश्चयता अधिक उजागर होनी थी, किन्तु ऐसा नहीं हुआ। अपितु पदार्थावस्था

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