जागृत मानव ही परंपरा सहज रूप में वैभव है। दश सोपानीय व्यवस्था क्रम में पीढ़ी से पीढ़ी जागृत होना ही परंपरा है। यही अभ्युदय, सर्वतोमुखी समाधान परंपरा है। इसी विधि से सर्व मानव समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व प्रमाण सहित सर्व शुभ परंपरा है।

जागृत मानव परंपरा में ही उत्पादन कार्य व्यवस्था सफल होता है।

  1. 7. शरीर पोषण-संरक्षण के साथ जागृति क्रम, जागृति ही शिक्षा-संस्कार कार्यक्रम है, में भागीदारी करना भी प्रयोजन है।

शिक्षा-संस्कार प्रक्रिया का आरंभ परिवार में ही होना स्वाभाविक है। जागृत मानव परंपरा का यह साक्ष्य है।

जागृत मानव परंपरा में हर परिवार में प्राप्त सन्तान के लिए जागृति सहज समीचीन रहती है। इसी विधि से जागृत मानव परंपरा प्रमाण वर्तमान होना सहज है।

जागृत परंपरा में ही उत्पादन-कार्य व्यवस्था सफल होता है। उत्पादन कार्य निपुणता, कुशलता, पाण्डित्य पूर्वक सर्व देश काल में आकाँक्षा द्वय के अर्थ में सफल होता है।

व्यवस्था-कार्य मूल्यांकन पूर्वक विनिमय संपन्न होता है।

ज्ञान, विवेक, विज्ञान संपन्न मानसिकता ही मानव लक्ष्य के अर्थ में मूल्यांकन होना स्वाभाविक रहता है। यह दश सोपानीय व्यवस्था विधि से गठित होना ही सामाजिक अखण्डता व्यवस्था सहज सार्वभौमता सहज प्रमाण है।

उत्पादन गुणवत्ता की पहचान शरीर पोषण-संरक्षण के अर्थ में व अखण्ड सार्वभौमता सहज समाज गति के अर्थ में है।

7.3 (2) गुणवत्ता की पहचान

आहार की गुणवत्ता : शरीर पोषण के रूप में

आवास की गुणवत्ता : शरीर संरक्षण बनाये रखने में आवश्यक शीत-वात-उष्मा से कम-अधिक का बचाव रूप में पहचान।

अलंकार : शरीर शोभा को व्यवस्था में भागीदारी के अर्थ में पहचान बनाये रखने के रूप में, शरीर सहज उष्मा को बनाये रखने में पहचान। संज्ञानीयता पूर्वक संवेदनाएं नियंत्रित रहने का प्रमाण।

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