ब्रह्म (व्यापक) में आत्मा चैतन्य इकाई सहज मध्यांश के रूप में होते हुए अनुभव योग्य क्षमता नित्य वर्तमान है । जीवन इकाई का विघटन नहीं होता । जीवन अमर है ।

विकास भेद से इस पृथ्वी पर प्रकृति चार अवस्थाओं में दृष्टव्य है ।

प्रत्येक इकाई प्रकृति का अभिन्न अंग है ।

ज्ञानावस्था की निर्भ्रम इकाई में जीवन सहज अमरत्व, शरीर सहज नश्वरत्व एवं व्यवहार के नियमों सहज ज्ञान है । अन्यथा वह उसके लिए बाध्य है ।

प्रकृति (क्रिया समुच्चय) एवं ब्रह्म सहज सहअस्तित्व अनादि काल से अनन्त काल तक है ।

प्रकृति अनंत इकाइयों का समूह है ।

प्रत्येक इकाई में विकास व ह्रास उसकी गति से उत्पन्न सापेक्ष शक्ति के अंतर्नियोजन तथा बहिर्गमन की प्रक्रिया पर आधारित है ।

शक्ति का अंतर्नियोजन ही जागृति (विकास) है ।

मूल इकाई का तात्पर्य परमाणु से है ।

विकास के संदर्भ में इकाई का तात्पर्य परमाणु से है ।

ब्रह्मानुभूति के योग्य क्षमता, योग्यता, पात्रता से संपन्न होने तक ही जागृति व भ्रम की संभावना बनी रहती है ।

ब्रह्मानुभूति पूर्ण क्षमता, योग्यता एवं पात्रता से संपन्न होना ही भ्रम मुक्ति है । चैतन्य इकाई का जड़ की आस्वादनापेक्षा से मुक्त होना एवं प्रेममयता में अथवा सत्ता में अनुभूत होना ही मोक्ष है। दया, कृपा, करूणा सहज संयुक्त प्रमाण ही प्रेम है ।

ब्रह्मानुभूति बोध सहज आनंद ही पाँचों ज्ञानेन्द्रियों में आस्वादन सुख की उपेक्षा है जिसे “पर वैराग्य” संज्ञा दी जाती है ।

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