इसमें मुख्य तथ्य यही है यथार्थता, वास्वतिकता, सत्यतापूर्ण विधि से अध्यापन सामग्री, वस्तु, प्रक्रिया परिपूर्ण रहना आवश्यक है। अनुसंधान के लिये (अज्ञात) प्रश्न चिन्ह अति आवश्यक है। हर अनुसंधान को अध्ययन और अध्यापन कार्य विधि से लोक व्यापीकरण होना सुगम हो जाता है। इस प्रकार अनुभव के अनन्तर ही ‘अनुभव बोध’ होना देखा गया है। यह हर व्यक्ति में होना समीचीन है।
जीवन सहज जागृतिपूर्ण प्रक्रिया में देखा गया है कि सह-अस्तित्व रूपी अस्तित्व में आत्मा ही अनुभूत होता है। फलस्वरूप आत्मा सहज मध्यस्थ क्रिया ही मध्यस्थ बल, मध्यस्थ शक्ति के रूप में प्रभाव क्षेत्र का होना देखा गया है।
इसी प्रभाव क्षेत्र वश ‘अनुभव’ का बोध बुद्धि में ‘अनुभव’ का साक्षात्कार चित्त में ‘अनुभव’ का सार्थकता तुलन रूपी वृत्ति में (न्याय, धर्म, सत्य) और ‘अनुभव’ का आस्वादन (मूल्य रूप में) मन में प्रभावित और स्वीकृत होता है। उसी क्षण से ‘निष्ठा’ की निरन्तरता पायी जाती है। ‘निष्ठा’ का तात्पर्य अनुभव प्रभाव का निरंतरता में ही जीवन की सभी क्रियाएँ अभिभूत रहने से है। अनुभव प्रभाव क्षेत्र स्वयं ही निरंतर होना पाया जाता है क्योंकि अस्तित्व में अनुभव से अधिक कुछ शेष रह नहीं पाती है। सम्पूर्ण अस्तित्व ही अनुभव गम्य होने के आधार पर मध्यस्थ क्रिया का प्रभाव क्षेत्र सदा-सदा के लिए जीवन क्रिया रूपी समस्त परावर्तन-प्रत्यावर्तन क्रिया में संतुष्ट, तृप्त, समाधानित होना देखा गया है। यही जीवनापेक्षा सहज सुख, शांति, संतोष, आनंद से भी इंगित है। आ.व. (2000), 58-65
(F) जानने-मानने का तृप्ति बिंदु = अनुभव
मानव में ही जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने की क्रियाकलाप परम्परा में स्पष्ट हो जाती है या प्रमाणित हो जाती है। जाने बिना मानना रूढ़िवादिता के रूप में स्पष्ट है। जानते हुए नहीं मानना एक अन्तर्विरोध अथवा ?? का स्वरूप होना पाया गया है। इसलिए यह समझ में आता है जानना, मानना मानव-परम्परा में, से, के लिए एक अनिवार्य क्रिया है। जानना मानना ही प्रमाण का आधार बनता है। प्रमाण क्रियान्वयन होने की स्थिति में पहचानना, निर्वाह करना भी होता है। प्रमाण किसके साथ प्रस्तुत होना है इस का पहचान होना आवश्यक है। इस विधि से सर्वमानव मानव के साथ ही जानने मानने का प्रमाण प्रस्तुत करता है। यह प्रमाण समाधान, समृद्घि, अभय, सहअस्तित्व ही होता है जिसके फलस्वरूप में सुख, शान्ति, सन्तोष, आनन्द होना पाया जाता है। अनुभव धारक ही वाहकता का स्रोत है। अनुभवमूलक विधि से ही अखंडता और सार्वभौमता का प्रमाण होना पाया जाता है। इसकी स्वीकृति अनुभव के पहले से ही मानव में सर्वेक्षित हुई है। इसे प्रत्येक व्यक्ति कर भी सकते हैं। हर निश्चयन निरीक्षण, परीक्षण, सर्वेक्षण की सहज प्रक्रिया से ध्रुवीकृत होता है और निश्चित होता है। - ज.व. 95-96
ज्ञानावस्था सहज मानव में, से, के लिये अनुभव प्रामाणिकता के रूप में सर्वोपरि प्रमाण है। नियम, न्याय, धर्म, सत्य यह अनुभवमूलक विधि से ही प्रमाणित होना देखा गया। अनुभव का मूल रूप (स्थिर बिन्दु) जानने-मानने का तृप्ति बिन्दु ही है। जानने-मानने का जो मौलिक स्थिति कारण-गुण-गणित है वह केवल मानव में ही होना पाया जाता है। यह कल्पनाशीलता और जागृति की सम्भावना के योगफल में गतित होना पाया जाता है। इसी प्रकार नियम, न्याय, धर्म, सत्य भी अध्ययन विधि से जानना, मानना बन जाता है। फलस्वरूप प्रामाणिक होने के लिये पहचानना, निर्वाह करना सम्भावना निर्मित होती है। - आ.व. 15-18