सह-अस्तित्व विधि से ही सम्पूर्ण प्रयोजन पूरकता, विकास, संक्रमण, जीवन, जीवनीक्रम, जीवन का कार्यक्रम, जागृति और जागृति का निरंतरता स्वाभाविक रूप में प्रयोजनों के अर्थ में ही स्पष्ट हो जाता है। जैसे - एक परमाणु में एक से अधिक अंश निश्चित दूरी में रहकर कार्य करता हुआ देखने को मिलता है। फलस्वरूप परमाणु एक व्यवस्था के स्वरूप में मौलिक प्रस्तुति है। इसी प्रकार विभिन्न संख्यात्मक अंशों से गठित परमाणुओं का; रचना कार्य के योगफल में व्यवस्था के रूप में वर्तमान रहना स्पष्ट हुआ है।
अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व में अथ से इति तक, सह-अस्तित्व ही सम्बन्धों का मूल सूत्र है। परमाणु अंशों का संबंध और उसका निर्वाह के समानता में परमाणु व्यवस्था, परमाणुओं के परस्पर संबंध और उसका निर्वाह बराबर अणु व्यवस्था; अणु-अणु के साथ परस्पर सम्बन्ध और उसका निर्वाह बराबर रचना व्यवस्था। हर रचनाएँ विरचित होते हुए पुन:रचना के लिये पूरक होना पाया जाता है।
जीवन और शरीर सम्बन्ध उसका निर्वाह वंशानुषंगीयता और व्यवस्था; जीवन और शरीर का परस्पर संबंध + जीवन जागृति सहज निर्वाह = संस्कारनुषंगीय अभिव्यक्ति एवं मानवीय व्यवस्था है।
मानवीयता सहज सभी सम्बन्धों का प्रधान प्रमाण व्यवस्था के रूप में जीना, समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना ही है। इस परम लक्ष्य को सदा-सदा परंपरा निर्वाह करने के क्रम में ही सभी प्रकार के सम्बन्धों को पहचानना मानव में, से, के लिये अनिवार्य है। इससे स्पष्ट हुआ है कि अस्तित्व ही सह-अस्तित्व के रूप में व्यवस्था में भागीदारी को प्रकाशित करता है। अस्तित्व में मानव अविभाज्य होने के कारण मानव अपने मानवत्व सहित व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करना ही जागृति, समाधान, सर्वतोमुखी समाधान, व्यवस्था उसकी निरंतरता ही मानव परंपरा में परम प्रयोजन है। यही महिमा सर्वमानव शुभ के रूप में प्रमाणित हो जाती है। यही सह-अस्तित्व पूर्ण परिवार, समाज पुन: अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था स्वरूप में स्पष्ट होना पाया जाता है।
उक्त तथ्यों का हृदयंगम और पारंगत विधियों से परिवार मानव के रूप में प्रमाणित होना स्वाभाविक है। यही मानव परंपरा का अनिवार्य आवश्यकता, सार्थकता है।
सम्बन्धों को मानव के सम्पूर्ण कार्य-व्यवहार के आधार पर सम्बोधन रूप में पहचाना जाता है। हर सम्बन्धों का प्रयोजन भी उसी के साथ स्पष्ट है।
सम्बन्धों के साथ ही शिष्टता विधि स्वाभाविक है। सम्बन्धों का सम्बोधन मानव संबंधों के आधार पर ही निश्चित मूल्य और शिष्टता का द्योतक होता है। यह परिवार (अखण्ड समाज) क्रम में और सभा-विधि में जैसे परिवार सभा और विश्व परिवार सभा में भी परस्पर सम्बोधन मानव संबंधों का सम्बोधन विधि से ही शिष्टता का निश्चयन है।
परिवार विधि में हर सम्बोधन प्रयोजन से लक्षित होना पाया जाता है। और हर प्रयोजन हर व्यक्ति के अपेक्षा सहित सम्बोधन का वस्तु है।