प्राकृतिक नियम

  • प्राकृतिक नियम चार सूत्रों से संबंद्घ है :-

पूरकता, उपयोगिता, नियम, नियंत्रण, संतुलन

  • उदात्तीकरण, संरक्षण
  • विकासक्रम, विकास, जागृतिक्रम, जागृति
  • त्व सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी
  • प्राकृतिक नियम:- अपने स्वरूप में, प्राकृतिक संपदा के साथ, मानव का अपने को नैसर्गिक संबंध के रूप में पहचान और पहचानने में विश्वास है, क्योंकि मानव के लिए मानवेत्तर प्रकृति नैसर्गिक है और मानवेत्तर प्रकृति के लिए मानव नैसर्गिक है। इसमें पूरकता विधि को निर्वाह करना प्राकृतिक नियम है।

संतुलन:- प्राकृतिक संपदा को ऋतु संतुलन के अर्थ में संरक्षित करना व करने में विश्वास; असंतुलन की स्थिति में, संतुलित बनाने में विश्वास। प्राकृतिक संपदा को उसकी अभिवृद्घि के अनुपात में संतुलन को ध्यान में रखते हुए उपयोग, सदुपयोग करने में विश्वास।

  • संरक्षण:- धरती, जलवायु, वन, खनिज को संरक्षित करने में विश्वास।
  • मूल्यांकन:- प्राकृतिक ऐश्वर्य को उपयोगिता के आधार पर मूल्यांकन करने में विश्वास।
  • उक्त तीनों नियमों (बौद्घिक, सामाजिक, प्राकृतिक नियम) में इंगित व्यावहारिक प्रमाणों के आधार पर मानव, मानवीय समाज रचना में अर्थात् अखण्ड समाज रचना कार्य में सफल होता है। -भ.व. 139-143

4.3 मानवीय सम्बन्ध एवं मूल्य

(A) मानव सम्बन्ध आधार

जीवन अपने स्वरूप में प्रत्येक मानव में समान रूप में कार्यरत है और होने की संभावना से परिपूर्ण है। इसे इस प्रकार देखा गया है कि जीवन रचना सम्पूर्ण जीवन में समान है। जीवन शक्तियाँ अक्षय रूप में हर जीवन में समान हैं। जीवन लक्ष्य प्रत्येक जीवन का समान है। जीवन सहज कार्यकलाप प्रत्येक जीवन में समान है। इन सभी वैभवों का प्रमाण मानव ही है। जागृत मानव में जीवन सहज लक्ष्य सार्थक होने के लिये चिन्हित, मार्ग स्पष्ट रहना, यही चिन्हित मार्ग को अर्थात् जीवन जागृति को परंपरा के रूप में अर्थात् धारक-वाहकता पूर्वक पीढ़ी से पीढ़ी सहज सुलभ करना-कराना और करने के लिये मत देना मानव सहज पुरूषार्थ परमार्थ का तात्पर्य है। जिसका साक्ष्य समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व है। जिसका व्यवहार रूप अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी है। – स.श. 186

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