• जागृत मानव अन्य की जागृति के लिये प्रवृत्त रहता है।
  • स्वस्थ मानव अन्य के स्वस्थता के लिए प्रयत्नशील रहता है।
  • समृद्घिशील मानव अन्य के समृद्घि सम्पन्नता में सहायक होने के लिये प्रवृत्तशील रहता है।
  • न्याय प्रदायी क्षमता सम्पन्न मानव, अन्य को न्याय सुलभ होने के लिये प्रवृत्तिशील रहता है।
  • किसी उत्पादन-कार्य में पारंगत मानव अन्य को पारंगत बनाने के लिये प्रवृत्तिशील रहता है।
  • मानव स्वयं व्यवस्था में जीता हुआ समग्र व्यवस्था में भागीदारी करते हुए अन्य को व्यवस्था में भागीदारी के लिये प्रेरित करने में प्रवृत्तिशील रहता है। - स.श. 191–192

परिवार सम्बन्ध, मानव सम्बन्ध, समाज सम्बन्ध ये सब आवश्यकतानुसार उपयोग करने का नाम है। सबका निर्देशित अर्थ, चिन्हित अर्थ अखण्ड समाज ही है। अखण्ड समाज का पहचान, लक्ष्य, प्रयोजन, प्रणाली, पद्घति, नीतियों के समानता से है। मानव लक्ष्य समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व होना ही है। प्रयोजन व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी है। मानवीयतापूर्ण पद्घति न्याय, उत्पादन, विनिमय, स्वास्थ्य-संयम और शिक्षा-संस्कार में पूरकता प्रणाली परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था प्रणाली और नीति तन, मन, धन रूपी अर्थ के सुरक्षा हैं, यही मानव का मौलिक अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन है। अस्तित्व नित्य प्रकाशमान होने के कारण अस्तित्व में हर वस्तु का प्रकाशित रहना स्वाभाविक है। - स.श. 197

अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था में, से, के लिये जागृति ही प्रधान आधार है। जागृति केवल मानव में ही होना पाया जाता है। इसलिये मानव में ही अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था की संभावना बनी हुई है। दूसरे विधि से हर-मानव स्व जागृति को वरता ही है। अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था की अपेक्षा करता ही है। यही ज्ञानावस्था सहज मौलिक अपेक्षा है। जागृति जीवन सहज अधिकार है। यही जीवन क्षमता के रूप में विद्यमान रहता है। यही योग्यता पात्रता के रूप में अभिव्यक्त, संप्रेषित और प्रकाशित होते हैं। - स.श. 196

‘सम्बन्ध’ एवं ‘संपर्क’ में अंतर

संबंध एवं सम्पर्क के विषय में एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक है।

इन दोनों में दायित्व का निर्वाह आदान प्रदान के आधार पर होता है परन्तु दोनों में भेद यह है कि संबंध की परस्परता में प्रत्याशाएं पूर्व निश्चित रहती हैं तथा इसके अनुरूप ही आदान प्रदान होता है।

  • सम्पर्क में आदान एवं प्रदान परस्परता में पूर्व निश्चित नहीं रहता। इसलिए सम्पर्क में आदान व प्रदान क्रियाएं ऐच्छिक रूप में अवस्थित हैं।
  • संबंध दायित्व प्रधान एवं सम्पर्क कर्तव्य प्रधान है।
  • सम्पर्क में परस्परता में स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष दयापूर्ण कार्य व्यवहार की अपेक्षा रहती ही है।
  • मानव अथवा इससे विकसित तक ही संबंध है जबकि समस्त इकाइयाँ परस्पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्पर्क में हैं ही। -व्य.द. अध्याय १६
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