नैतिकता – परिभाषा

व्यवहार ही नैतिकता व अनैतिकता के रूप में समीकृत होता है। नैतिकता व्यवहार का आधार, नैतिकता का आधार धर्म है। नीतियां धर्म के आधार पर ध्रुवीकृत होती हैं। धर्म मूलक अथवा धर्म गामी नीतियां हैं। जीवन मूल्य ही धर्म है। समाधान ही मानव धर्म है। धर्म में प्रयोजित होना ही धर्म नीति है। नैतिकता का तात्पर्य धर्म, राज्य नीतिपूर्ण आचरण है। यही क्रम से सदुपयोग और सुरक्षा है। अर्थ का सदुपयोग सुरक्षा, मानव मूल्य में, से, के लिए होता है – डायरी 1983 [D] FC /६१-६२

स्वरूप

कोई भी मानव स्वयं का शोषण नहीं चाहता है। विकास की दिशा में जो समस्त अवरोध है, वह ‘शोषक’ तथा सहायक समस्त तत्व ‘पोषक’ हैं। अतएव, यह सिद्ध हुआ कि जागृति को अवरुद्ध करने वाली समस्त क्रियाएँ ‘शोषण’ हैं तथा जागृति को गतिशील करने वाली समस्त क्रियाएँ ‘पोषण’ हैं।

प्रत्येक इकाई परस्परता से प्रभावित है, चाहे वह प्रभाव स्थूल हो अथवा सूक्ष्म हो। चूंकि यहाँ मानव इकाई के पोषण एवं शोषण का विश्लेषण है, अत: हमें व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र तथा अंतर्राष्ट्रीय भेद से विश्लेषण करना होगा। अंतर्राष्ट्रीय मानव समुदाय एक है तथा सब की साम्य कामना ‘सुख’ ही है। निरंतर सुख की उपलब्धि ही मानव का चरम विकास है तथा सुख की स्थिति में ही मानव अपने को वातावरण के दबाव से मुक्त अनुभव करता है। सुखी मानव अन्य का पोषण करने में भी समर्थ होता है। भय से निवारण हेतु समुदाय रुपी सामाजिकता की कामना मानव ने किया।

सामाजिकता का अर्थ ही है संबंध एवं संपर्क का निर्वाह। संबंध एवं संपर्क के निर्वाह के लिए आधारभूत प्रेरणा स्रोत चार हैं :-

(1) सभ्यता, (2) संस्कृति, (3) व्यवस्था (4) विधि।

सभ्यता, संस्कृति, व्यवस्था और विधि पूर्वक मानव ने प्राप्त अर्थ का नियोजन करते हुए सुख की अनुभूति की कामना की है। छोटी से लेकर बड़ी इकाई तक ने अर्थ का उपयोग और उपभोग करते हुए सुखी होने का प्रयास किया है, पर जब एकाकी प्रयोग से उसे सुख की उपलब्धि नहीं हुई तो समाज का गठन हुआ तथा ऐसे गठित समाज में संपर्क एवं संबंधों के निर्वाह के लिए नियम स्वीकृत हुए। इन नियमों का सभ्यता एवं संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में अध्ययन करने का प्रयास किया गया तथा इन्हें आवश्यकीय तथा अनावश्यकीय नियमों के रूप में माना गया। साथ ही इन्हें ऐसा ही मानने और प्रयोग करने हेतु प्रेरणा देने के लिए व्यवस्था और विधि का जन्म हुआ। - व्य.द. अध्याय १६

अंतरराष्ट्रीय नीति में विस्तार नीति, राष्ट्रीय नीति में पद व वर्ग नीति, सामाजिक नीति में परधन परनारी/पुरुष, एवं परपीड़ात्मक नीति और व्यक्तिगत नीति में संग्रह ही पीड़ा का कारण है , जिससे क्षोभ उत्पन्न होता है।(विस्तार की कामना मात्र पांच ऐश्वर्यों के लिए ही है - बल, बुद्धि, रूप, पद व धन)। शोषण से ही क्षोभ उत्पन्न होता है। इसके

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