राज्य नीति: परिभाषा
- राज्य नीति का अर्थ: - तन एवं धन की सुरक्षा के लिए विधि-व्यवस्था प्रदान करने हेतु जो निश्चित कार्यक्रम है, उसे ‘राज्य नीति’ संज्ञा है।
- राज्य: - जिस भू क्षेत्र में मानव का आवास है और साथ ही जो एक ही संविधान तंत्र के अधीन हो उसे ‘राज्य’ संज्ञा है। (व्य.द. 1978, 169)
राज्य नीति: आवश्यकता
- मानव प्रयोग व व्यवसाय द्वारा प्राप्त अर्थ तथा प्राकृतिक सम्पदा की सुरक्षा की कामना करता है, क्योंकि उसमें उसका श्रम नियोजित एवं प्रायोजित है। ऐसा सुरक्षा के लिए राज्य-नीति का अध्ययन व समझ का परिपालन आवश्यक है।
राज्य नीति: लक्ष्य एवं साध्य
राज्य नीति का लक्ष्य अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था की अक्षुण्णता है। अमानवीयता से मानवीयता की ओर प्रगति हेतु मार्ग प्रशस्त करने के लिए साधन, अवसर तथा व्यवस्था की स्थापना एवं सुरक्षा जो अतिमानवीयता को प्रोत्साहन देने में समर्थ हो।
राज्यनीति सहज लक्ष्य को सार्थक और सर्वजन सुलभ बनाने की कामना से समझदारी की आवश्यकता है। यदि समस्या है तो समाधान है ही। समाधान के आधार पर निश्चितता को पाना अनिवार्य है।
इसके पूर्व में न्यायवादी और अवसरवादी व्यवहार का विश्लेषण किया जा चुका है। अवसरवादी नीति से अनिश्चित दिशा, गति एवं घटना ही संभव है, जिससे व्यवस्था में स्थिरता तथा विश्वास नहीं उत्पन्न कराया जा सकता। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि न्यायवादी नीति के विकास तथा व्यव्हारान्वयन के लिए मानवीयता ही आधार है।
समस्त मानव समाज द्वारा बौद्धिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक क्षेत्र में ही विभिन्न कार्य संपादित किये जा रहे हैं। इन तीनों क्षेत्रों में किया गया कार्य ही मानव के लिए सम्पूर्ण व्यवहार कार्य है।
राज्य-नीति का लक्ष्य तन, मन, एवं धन की सुरक्षा है तथा इसके लिए विधि तथा व्यवस्था प्रदान करना है. इस क्रम में यह जान लेना आवश्यक है कि बौद्धिक नियम की अवधारणाएं ही क्रम से व्यवहार काल में प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक नियमों का अनुसरण करती हैं, जिससे विकास या ह्रास सिद्ध होता है। यहाँ हम बौद्धिक, सांस्कृतिक, तथा प्राकृतिक क्षेत्र में किये जा रहे व्यवहार की विधि व निषेध पक्ष का अध्ययन करेंगे।