- पिता-माता एवं पुत्र-पुत्री संबंध,
- पति-पत्नी संबंध,
- गुरु और शिष्य संबंध,
- भाई और बहिन संबंध,
- मित्र संबंध
- साथी-सहयोगी संबंध
- व्यवस्था संबंध
(*संबंधों पर जानकारी '4.3 सम्बन्ध एवं मूल्य' में दिया गया है )
मानव के लिए सुख ही धर्म है। सुख की आशा से ओतप्रोत मानव को एक क्षण के लिए भी इस कामना से विमुख नहीं किया जा सकता। धर्म की परिभाषा ही इस प्रकार की गई है कि “जिससे जिसका वियोग न किया जा सके, अथवा जिसका वियोग सम्भव न हो, वह उसका धर्म है।” धर्म की इसी परिभाषा के आधार पर पदार्थ का धर्म ‘अस्तित्व’, अन्न व वनस्पति का धर्म ‘पुष्टि’, जीवों का धर्म ‘जीने की आशा’ और मानव का धर्म ‘सुख’ प्रतिपादित किया गया। यह भी प्रतिपादित किया गया कि हर विकसित अवस्था की इकाई में अविकसित इकाई का धर्म विलय रहता ही है।
धर्मनीति के परिपालन से समस्त सम्पर्कात्मक तथा सम्बन्धात्मक व्यवहार में क्या अपेक्षा की जाती है, जिससे कि जीवन सफल होता है नीचे दर्शाया गया है। ऐसी धर्मनैतिक व्यवस्था तथा इसके लिए किया गया समस्त व्यवहार, प्रयोग तथा प्रयास पोषक अन्यथा में शोषक है।
- पुरुष का जीवन यतित्व से सफल है।
- स्त्री का जीवन सतीत्व से सफल है।
- माता-पिता का जीवन व्यक्तित्व से।
- पुत्र का जीवन नैतिकता के प्रति निष्ठा से।
- राज्य व्यवस्था, न्यायपूर्ण नियम के समर्थन व पालन से।
- प्रजा का जीवन समग्र व्यवस्था में भागीदारी से तथा अनुशासन एवं नियम को स्वीकारने से।
- गुरु का जीवन अनुभव को प्रामाणिकता पूर्वक अध्ययन कराने से।
- शिष्य का जीवन गुरु द्वारा कराये गये अध्ययन के श्रवण, मनन तथा अर्थबोध सम्पन्नता से।
- सहयोगी का जीवन कर्त्तव्य को निर्वाह करने से।
- साथी का जीवन दायित्वों को निर्वाह करने से।
- भाई या बहन का जीवन एक दूसरे के अनन्य विकास की आशा एवं प्रयास से तथा स्नेह सहित दायित्व वहन करने से।
- मित्र का जीवन परस्पर दिखावा रहित, उदारता पूर्ण, संग्रह रहित विकास के ओर गति सहित अनन्यता से सफल या असफल है
(*धर्म नीति पर अधिक जानकारी '6.5 मानवीय परम्परा' अध्याय में 'संस्कृति-सभ्यता' के अंतर्गत दिया गया है )