• व्यवस्था स्वयं में न्याय, उत्पादन और विनिमय सुलभता ही है। इन्हीं की निरन्तरता के लिये स्वास्थ्य-संयम और मानवीय शिक्षा-संस्कार एक अनिवार्य स्थिति है। इस प्रकार व्यवस्था का पाँच आयाम होता है।
  • इन्हीं आयामों में भागीदारी, ‘व्यवस्था में भागीदारी’ का तात्पर्य है।
  • इस प्रकार हर जागृत मानव (परिवार मानव) सहज रूप में व्यवस्था को प्रमाणित करता है। यही अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का आधार और अभिव्यक्ति है। - स.श. 193

परिवार की परिभाषा भी है परस्पर सम्बन्धों को पहचानते हैं, मूल्यों का निर्वाह करते हैं, मूल्यांकन करते हैं और उभयतृप्ति पाते हैं। यही परिवार का आधार बिन्दु है। अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था का सूत्रपात ‘‘परिवार मानव’’ पद ही है। परिवार व्यवस्था सार्वभौम व्यवस्था के लिये सूत्र है। परिवार रचना स्वयं अखण्ड समाज रचना का सूत्र है। जागृत परिवार मानव परिवार सहज आवश्यकता के लिये समझदारी से अपनाया उत्पादन-कार्य के लिये एक-दूसरे के पूरक होना पाया जाता है। इस विधि से हर परिवार में समाधान, समृद्घि प्रमाणित होती है, अभय सह-अस्तित्व का सूत्र समाया रहता है। इसे प्रमाणित करने की आवश्यकता क्रम में अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था का ताना-बाना, इसलिये बना है कि समाज ही व्यवस्था और व्यवस्था ही समाज को संतुलित बनाये रखता है। - स.श. 172-173

परिवार एवं सभा = समाज एवं व्यवस्था

परिवार क्रम विधि से समाज रचना, सभा क्रम में व्यवस्था गति स्पष्ट हो जाता है। जैसे परिवार ही स्वायत्त मानवों का संयुक्त अभिव्यक्ति होना स्पष्ट किया जा चुका है। हर नर-नारी स्वायत्त पद में ही परिवार मानव अर्हता, स्वत्व, स्वतंत्रता, अधिकार को प्रमाणित करते हैं। - स.श. 172-173

स्वायत्त मानव पंरपरा में सभा क्रम, परिवार क्रम, १०-१० की संख्या में सहज ही पहचाना जाता है। सर्वमानव स्वायत्त मानव रूप में अपने प्रतिष्ठा को जानने-मानने, पहचानने-निर्वाह करने का सौभाग्य मानवीयतापूर्ण शिक्षा परंपरा में, से नित्य गति के रूप में समीचीन रहता है। सह-अस्तित्व विधि से व्यवस्था को, जागृति विधि से परिवार को पहचानना, निर्वाह करना मानव सहज आवश्यकता व वैभव है। अस्तित्व सहज रूप में ही सह-अस्तित्व वर्तमान है। यथा पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था, ज्ञानावस्था, इसी धरती पर नियति क्रम विधि से प्रमाणित है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि जागृति का धारक-वाहकता प्रत्येक मानव का जागृति सहज स्वत्व है; और सह-अस्तित्व सहज वैभव है। इस प्रकार अस्तित्व सहज व्यवस्था को जानना-मानना-पहचानना, निर्वाह करना ज्ञानावस्था सहज जागृत मानव से ही प्रमाणित होती है। जागृति सहज विधि से ही समाज रचना स्वाभाविक होता है अथवा होने वाला स्वरूप है। होना वर्तमान ही है। वर्तमान की निरंतरता है। इसलिये व्यवस्था एवं समाज की निरंतरता है। - स.श. 175

प्रत्येक परमाणु अपने भार बंधनवश अणुबंधनपूर्वक रचनाओं को प्रमाणित किया उसमें से एक रचना यह धरती है। इसी धरती में प्राणावस्था के वनस्पति संसार, जीवास्था के जीव संसार, ज्ञानावस्था के मानव परंपरा का शरीर रचना और पदार्थावस्था में रासायनिक-भौतिक रचनाएं हमें दिखती हैं। रासायनिक-भौतिक रचना रूपी जीव शरीरों द्वारा वंशानुषंगीय विधि से व्यवस्था को जीवन ही प्रमाणित करता है और मानव संस्कारानुषंगीय (समझदारीपूर्ण) विधि से

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