6.8 अखंडता सहज मानव में समानता के बिंदु
- मानव सहज जाति एक
- सर्वमानव में लक्ष्य समान
- सर्वमानव में शुभाकांक्षा समान
- सर्वमानव में मानवत्व समान
- सर्वमानव में मानव धर्म समान है
- मानव में, से, के लिये यह धरती एक अखण्ड है।
- मानव भाषा कारण, गुण, गणित के अर्थ में समान है।
- मानवीय सभ्यता, संस्कृति, विधि, व्यवस्था सर्वमानव में, से, के लिये समान है
1. मानव सहज जाति एक
अखण्ड समाज ज्ञान, विवेक, विज्ञान, प्रयोजन, भाषा, कार्य-व्यवहार में, से, के लिये जाति पक्ष पर विचार करना एक आवश्यक मुद्दा है। जाति कल्पना लोकव्यापीकरण होकर विविधतापूर्वक पनपते आई। अनेक जाति कल्पना के आधार पर अनेक समुदाय ही होना पाया गया। (*व्यवसाय के आधार पर जाति को माना गया। कर्म से जाति को माना गया) ऐसी समुदाय और समुदाय कल्पनाओं में से अखण्डता का सूत्र निष्पन्न नहीं हुआ। जबकि मानव परंपरा का अस्तित्व अखण्डता और उसकी व्यावहारिक मानसिकता के साथ ही वर्तमान में विश्वास, स्वयं में विश्वास सहज विधि में, से, के लिये मानवीयतापूर्ण योजनाओं से सम्पन्न होकर आश्वस्त होने की व्यवस्था है, क्योंकि प्रत्येक मानव देश और कालवादी परिज्ञान से सूत्रित रहता ही है। - स.श. – 100 (*मानव शरीर रचना के आधार पर, अंग-अवयव, उनके कार्यकलापों में समानता के आधार पर मानव जाति एक होना समझ आता है –लेख २०१२)
परिवार मूलक स्वराज्य विधि से सार्वभौमता का अर्थ सार्थक होता है। इसलिये भी मानव जाति एक होना पाया जाता है। - स.श. 105
मानवीयतापूर्ण आचरण विधि से समस्त मूल्य, मानवीय चरित्र और नैतिकता का अविभाज्यता प्रमाणित होता है। दूसरे विधि से मूल्य, चरित्र, नैतिकता में, से, के लिये हर व्यक्ति प्यासा है। इसलिये समझदारी का फलन रूपी मानवीयतापूर्ण आचरण विधि से मानव जाति का एकता, अखण्डता, व्यवस्था विधि से सार्वभौमता प्रमाणित होती है। - स.श. 107
2. सर्वमानव में लक्ष्य समान
इसके पहले स्पष्ट किये गये मुद्दों के साथ-साथ सर्वमानव में लक्ष्य समानता की बात, तथ्य विभिन्न विधि से स्पष्ट किया गया। मुख्यत: मानव सहज लक्ष्य केवल जागृति और उसका प्रमाण है। प्रमाण केवल परंपरा में ही होना देखने को