को कम अथवा दूर करने में अपने को बारम्बार दुहराता है। साथ ही युद्घ प्रभाव से जो वीभत्सता है, प्राकृतिक प्रकोपों से त्रस्त मानव, अकाल, दुष्काल, और विशेष रोगों से पीड़ित एड्स जैसे रोग पीड़ित व्यक्तियों के प्रति अपने संवदेनाओं को अर्पित करते हुए इन्हें सांत्वना देने का घोर प्रयास करते आया है। इन सब प्रयासों को देखते हुए इनके मूल में अवश्य ही एक सार्वभौम व्यवस्था की अभिव्यक्ति की आवश्यकता बनी हुई है। इस ओर सार्वभौम व्यवस्था जैसा धरती में एक व्यवस्था की चर्चा, पहल, प्रयास भी लोगों ने किये हैं। जो ऐसे प्रयास किये हैं उनमें मानव, मानवत्व, सार्वभौम व्यवस्था का रूप रेखा, मानसिकता, विश्व दृष्टिकोण सहित प्रस्तावित होना प्रतिक्षित है।
ऐसे ‘मानवाधिकार’ धरती पर एक शासन, विचार या चर्चा, मेधावी मानवों के साथ जुड़ा है। हमारा यह प्रस्ताव है कि इसे सफल बनाने के लिये विश्व दृष्टिकोण संबंधी विकल्प आवश्यक है। इस विधा में अस्तित्वमूलक मानव केन्द्रित चिन्तन ज्ञान प्रस्तावित है। इसी क्रम में जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन सहज ही अध्ययन किये हैं। यह पूर्णतया दर्शन और ज्ञान के रूप में, पूर्ववर्ती दर्शन-ज्ञान के विकल्प के रूप में प्रस्तावित है। अस्तित्व ही स्वयं सह-अस्तित्व, नित्य विद्यमान होने के आधार पर सह-अस्तित्व स्वयं विचार का आधार, फलित होने का क्रम हमें अध्ययन गम्य हुआ है। विचारधारा जो पूर्ववर्ती क्रम में प्राप्त है उसके स्थान पर सह-अस्तित्ववादी विचारधारा को प्रस्तावित किया है। अभी तक जो-जो शिक्षाएं इस धरती के मानव के साथ बीत चुकी है, इस समय में जो-जो शिक्षाएं दे रहे हैं उसके विकल्प में मानवीयतापूर्ण सह-अस्तित्ववादी शिक्षा कार्यक्रम प्रस्तावित है। सह-अस्तित्व सहज अध्ययन क्रम में हम यह पाये हैं अस्तित्व में व्यवस्था है, शासन नहीं है।
इसीलिये सार्वभौम व्यवस्था शासन के विकल्प के रूप में प्रस्तावित है। इसी क्रम में शक्ति केन्द्रित शासन संविधान के स्थान पर समाधान केन्द्रित व्यवस्था रूपी संविधान मानवीय आचार संहिता के रूप में (सार्वभौम राष्ट्रीय आचार संहिता) प्रस्तावित किया है। इसके लिये कार्यक्रम का हम धारक-वाहक हैं। जीवन-ज्ञान, अस्तित्व दर्शन का अध्ययन शिविर कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं और शिक्षा का मानवीयकरण कार्य में तत्पर हैं। मानवीयतापूर्ण आचरण विधि से हम जीते ही हैं। इन सभी कारणों से हम उक्त प्रस्तावों को प्रस्तावित करते हुए प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।
उक्त प्रस्तावों के आधार पर मानवाधिकार सुस्पष्ट हो जाता है फलस्वरूप परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था पूर्वक सार्वभौम शुभ रूपी समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व को सर्वसुलभ कर सकते हैं। इसकी अक्षुण्णता का होना समीचीन है। यही सर्वशुभ है।
4. सर्वमानव में मानवत्व समान
मानवीयतापूर्ण आचरण मूल्य, चरित्र, नैतिकता के अविभाज्य रूप में वर्तमान होना पाया जाता है। सर्वमानव में मानवत्व ही व्यवस्था का सूत्र है। मानवत्व अपने में स्वायत्तता ही है। उसके प्रमाण में आचरण एक अनिवार्य स्थिति है। मानवत्व जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण का संयुक्त स्वरूप है क्योंकि मानव ज्ञानावस्था की इकाई है। ज्ञानावस्था का तात्पर्य ही है जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना। यह महिमा केवल मानव में संभावित, कार्यान्वित, इच्छित है। हर मानव अज्ञात, अप्राप्त, पीड़ाओं से मुक्ति चाहता है। ऐसे वैभव अर्थात् पीड़ा से