‘मानव धर्म’ अपने स्वरूप में समाधान और उसकी निरंतरता है। दूसरे तरीके से सर्वतोमुखी समाधान और उसकी निरन्तरता है। अस्तित्व में समाधान का धारक-वाहक केवल मानव ही है। इस धरती पर आज की स्थिति में जैसा भी मानव दिखाई पड़ता है विभिन्न भौगोलिक परिस्थिति, आर्थिक सम्पदा, शक्ति केन्द्रित शासनाधिकार, सम्पन्नता, प्रौद्योगिकी, कृषि, व्यापार, उपभोक्ता संस्कृति व दलाली, उपदेश, समाजसेवा, धार्मिक कार्यक्रमों में कहीं न कहीं किसी न किसी कार्य में लगा मानव को देखा जाता है। यह सब किसी न किसी समुदायगत विचार, धर्म-पंथ, मत, जाति आदि आधारों पर अपना परिचय देता हुआ देखने को मिलता है। इस क्रम में उन-उनकी निष्ठा अपने-आप स्पष्ट हो जाती है। आज तक ऐसा कोई परम्परा अध्ययनगम्य नहीं हो पाया जो सर्वतोमुखी समाधान विधि को अध्ययनगम्य कराया। अतएव सर्वतोमुखी समाधान सम्पन्नता ही मानव धर्म का द्योतक है, प्रमाण है और सर्वाधिक लोगों का अभीष्ट भी है।

मानव जाति एक होने के आधार पर ही मानव धर्म एक होने का अर्थात् सर्वतोमुखी समाधान सबको समीचीन होने का सत्य उद्घाटित हो पाता है। समाधान मूलत: मानव जीवन सहज उद्देश्य और प्रमाण है। इस उद्देश्य की पूर्ति जागृतिपूर्वक उजागर होती है। जागृति का सार्थक स्वरूप अस्तित्व में अनुभव है। अस्तित्व नित्य वर्तमान होते हुए अनुभव का घोषणा, सत्यापन, प्रमाण, मानव ही मानव के लिये अर्पित करता है। प्रामाणिकता ही व्यवहार में सर्वतोमुखी समाधान के रूप में प्रमाणित हो जाता है। अस्तित्व में अनुभव ही जागृति परमता का द्योतक है। जागृति ही भ्रम मुक्ति है। आदिकालीन अथवा सुदूर विगत से सुना हुआ ‘मुक्ति’ शब्द का अर्थ सह-अस्तित्व में अनुभव रूप में सार्थक होता है। इसे भली प्रकार से देखा गया है। सह-अस्तित्व में अनुभव सर्वसुलभ होने का मार्ग मानवीय शिक्षा-संस्कार विधि से समीचीन है और प्रशस्त है। सह-अस्तित्व शाश्वत सत्यरूपी, नित्य सत्यरूपी, परम सत्यरूपी न घटते-बढ़ते हुए मानव सहित अविभाज्य वर्तमान है। इसमें खूबी यही है अस्तित्व ही चार अवस्था में प्रकाशमान है। जिसमें से एक अवस्था स्वयं में मानव है। अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व ही इसका मूल सूत्र है। सह-अस्तित्व ही विकास, पूरकता, उदात्तीकरण, फलस्वरूप रासायनिक-भौतिक रचनाएँ, विरचनाएँ सम्पन्न होते हुए देखने को मिलता है। देखने वाला मानव ही है। विकास, अर्थात् परमाणु में विकास, पूरकता, पूर्णता, संक्रमण, जीवन और जीवन जागृति प्रमाणित होता है। जीवन में जीवन जागृति का प्रमाण मानव ही प्रस्तुत करता है। मानव अपने में जागृतिपूर्णता में उसकी निरन्तरता सहज विधि से ही सर्वतोमुखी समाधान सम्पन्न परंपरा को बनाए रखना सहज है।

अस्तित्व में इस खूबी को बहु विधा में देखा गया है। प्रत्येक प्रजाति सहज परमाणु अपने परम्परा सहज आचरणों में सुदृढ़ रहते हैं। जैसे - दो अंश, चार अंश, चालीस अंश आदि विभिन्न अंशों से गठित विभिन्न परमाणु अपने-अपने आचरण को सदा-सदा ही प्रस्तुत करते हैं। इसी क्रम में प्राणावस्था की इकाइयाँ बीज-वृक्ष न्याय से अपने परम्परा रूपी आचरण को सुदृढ़ रूप में आचरित करते हुए देखने को मिलता है। वंशानुषंगीय विधि से सम्पूर्ण जीव अपने-अपने परंपराओं को सुदृढ़ बनाया हुआ दिखाई पड़ता है। इन तथ्यों को देखते हुए मानव अपने परम्परा को मानवीयतापूर्ण आचरण, मानव सहज सर्वतोमुखी समाधान रूपी मानव धर्म (मानवीयतापूर्ण आचरण, विचार, अनुभव सम्मत विधि से) निरन्तरता को पाना संभव है।

सर्वमानव सहज रूप में ही समान है। इसीलिये मानव धर्म सर्वमानव में समान है। यह तथ्य समझ में आता है। सर्वतोमुखी समाधान का तात्पर्य ही है स्वयं व्यवस्था में और समग्र व्यवस्था में भागीदारी का निर्वाह करना। इसी विधि से मानव

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