मुक्त वैभव जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान के रूप में दृष्टव्य है। ऐसे वैभव का अधिकार सम्पन्नता स्वयं मानवत्व है।
अस्तित्व में प्रत्येक एक अपने ‘त्व’ सहित व्यवस्था है जैसे गाय, घोड़ा, बिल्ली सबमें उन-उनका ‘त्व’ देखने में मिलता है। गायत्व ही गाय का, श्वानत्व ही श्वान का, बिल्वत्व ही बिल्व वृक्ष का, धातुत्व ही धातु का एवं मणित्व ही मणि के पहचान का आधार है। इसी प्रकार मानवत्व ही मानव के पहचान का आधार है। मानवत्व ही अपने में ज्ञानावस्था की प्रतिष्ठा है। इसी आधार पर संज्ञानशीलता, संवेदनशीलता का संगीत बिन्दु अथवा तृप्ति बिन्दु मानवीयतापूर्ण आचरण के रूप में प्रमाणित हो जाता है।
इस विधि से सर्वमानव में मानवत्व समान रूप में विद्यमान होना स्पष्ट हो जाता है। यह मानव परंपरा सहज चौमुखी कार्यक्रमों के आधार पर सफल हो जाता है क्योंकि अभी जो कुछ भी इस चौमुखी कार्यक्रमों के द्वारा अग्रिम पीढ़ी को दिया जा रहा है वह अधिकांश आगे पीढ़ी में बहता हुआ देखने को मिलता है। जैसे विज्ञान शिक्षा, उन्मादत्रय शिक्षा, सुविधा संग्रह शिक्षा दिया जा रहा है यह अग्रिम पीढ़ी में उनके कल्पनाशीलता के साथ अनुरंजित, प्रतिरंजित होकर प्रभावशील रहता है। इसीलिये मानवीयतापूर्ण शिक्षा की संभावना, आवश्यकता समीचीन है। प्रयोजनों के लिये नितान्त अपेक्षा है ही।
अस्तु, सर्वमानव में मानवत्व समान रूप में होना मूल्यांकित होता है क्योंकि अस्तित्व घटता-बढ़ता नहीं है। जीवन अपने गठनपूर्णता, अक्षय बल, अक्षय शक्ति, जीवन जागृति के लक्ष्य सम्पन्नता में एक ही है। इसलिये जीवन मूलक विधि से ही मानवत्व समझ में आता है। शरीर मूलक विधि से मानवत्व समझ में नहीं आता है। इसी सत्यतावश ज्ञानावस्था के मानव में जीवन सहज अभीप्सा के आधार पर मानवत्व ही जीवन-ज्ञान, अस्तित्व दर्शन इसके प्रमाण में मानवीयतापूर्ण आचरण प्रमाणित होना सहज है। मानवत्व के आधार पर अभी तक बिखरे हुए सभी समुदाय अपने को मूल्यांकित कर सकते हैं और मानवत्व और मानव परंपरा की अखण्डता को पहचान सकते हैं, निर्वाह कर सकते हैं। इस प्रकार अखण्ड समाज के अर्थ में और सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में, विविध प्रकार से भ्रमित हुई अपने पराये की दूरियाँ अपने आप जागृति विधि-विधानपूर्वक समाप्त होंगे। - स.श. 105–107
5. सर्वमानव में मानव धर्म समान है
धर्म के नाम से विडम्बना विविध आधारों से चला हुआ समुदायों का धर्म जो रूढ़ियों के रूप में देखने को मिला है, उसकी विकरालता और अंतहीन समस्याओं से ग्रसित रूपों में दिखाई पड़ती है। किसी भी समुदाय धर्म के पास धर्म का मूल रूप अध्ययनगम्य होना संभव नहीं हुई। इसकी रिक्तता, कुण्ठा, श्रेष्ठता, नेष्टता में फँसे हुए, विचारों के साथ मानव जनजाति अपने आप में यंत्रणा का शिकार हो जाता है, इसे बारंबार देखा जाता है। इसे वांड्मयों के आधार पर तर्क विधि से विद्वानों के बीच चर्चित होना देखा गया है। राज्य विधाओं में भी सत्ता संघर्ष, शक्ति केन्द्रित शासन, पीठ और चिन्ह के लिये तमाम घटनायें गुजर चुके हैं। जिसका स्वीकृति आम आदमी के मन में नहीं हो पाता है। इसलिये असंतुष्टि बना ही है। इसलिये इसकी संतुष्टि स्थली का अनुसंधान और प्रकाशन की आवश्यकता है ही।