जाने हुए को मानना एवं माने हुए को जानना ही अभ्यास है।- अ.द. २-२२, (*संशोधन प्रति देखें: B13_अभ्यास दर्शन_1998_Typeset_corrected _c/८)

जागृति विधि साधना

प्रत्येक जागृत मनुष्य न्याय दृष्टि से (न्याय रूपी तुलन क्रिया से) निरीक्षण परीक्षण करता है। यह क्रिया जागृति विधि साधना का प्रथम सोपान है। साधना का तात्पर्य अभ्यास से है। अभ्यास का तात्पर्य कर्माभ्यास, व्यवहाराभ्यास, चिन्तनाभ्यास से है। व्यवस्था के मूल में जो विचार रहता है, उसको मनुष्य के हर कार्य में चिंतनाभ्यास पूर्वक न्याय-दृष्टि से निरीक्षण परीक्षण करना - जागृति विधि है।

चिन्तन का तात्पर्य समझ और प्रयोजन के तृप्ति बिन्दु का साक्षात्कार करने से है। प्रत्येक जागृत मनुष्य में, जीवन सहज रूप में, तुलन क्रियायें न्याय-अन्याय, धर्मा-धर्म, सत्या-सत्य क्रम से प्रिय, हित, लाभ न्याय संगत सम्मत सहज संपन्न होती है। न्याय सम्बन्धों रूपी सह- अस्तित्व पर आधारित है। धर्म (सर्वतोमुखी समाधान - मनुष्य स्वयं मानवत्व सहित व्यवस्था है, समग्र व्यवस्था में भागीदार है।) इस आधार पर सत्य अस्तित्व रूपी परम सत्य में, अनुभव अर्थात् जानने-मानने के तृप्ति बिंदु, अभिव्यक्ति सहित रूप में प्रमाणित है। -म.वि. 184, 185

(iv) जीवन में गुणात्मक परिवर्तन क्रम

अनुकरण तथा अनुसरण:

१. न्यायपूर्ण व्यवहार का अनुकरण या अनुसरण करना।

२. धर्म-पूर्ण विचार में प्रसक्त (प्रवृत्त) होना।

× उपरोक्त दोनों कार्यक्रम की दृढ़ता एवम् निष्ठा की अपेक्षा में सत्यता की अनुभूति का अधिकार परिणाम पूर्वक प्राप्त होता है, फलस्वरूप बुद्धि आप्लावित हो जाती है।

उपरोक्तानुसार जब साधक मानवीयतापूर्ण व्यवहार एवम् धर्म पूर्ण विचार में प्रतिष्ठित हो जाता है तब मन वृत्ति, चित्त और बुद्धि की क्रियाएँ किस प्रकार से सम्पादित होती हैं इसका अनुभूतिपरक वर्णन निचे दिया गया है।

Page 326 of 335