मन जब वृत्ति का संकेत ग्रहण करने योग्य होता है,
- तब न्यायपूर्ण व्यवहार में परिवर्तित होता है, जो मित्र आशाएँ हैं। मैत्री तथा न्याय की प्रत्याशा ही स्नेह के रूप में प्रदर्शित होती है। स्नेह की प्रतिक्रिया ही सुख तथा सुख न्याय की निर्विरोधिता ही है। मानवीयता के संरक्षणात्मक, परिपालनात्मक और आचरणात्मक नियमों की ही ‘न्याय’ संज्ञा है।
वृत्ति जब चित्त का संकेत ग्रहण करने योग्य होती है,
तब शान्ति का अनुभव होता है। विचार की पुष्टि चिन्तन (चित्रण) से ही है। चिन्तन से ही प्रक्रिया, फल और प्रयोजन का निर्णय होता है।
- अत: मन, वृत्ति तथा चित्त की एकसूत्रता से (परानुक्रमता से) न्यायपूर्ण व्यवहार के लिए मित्र आशाएँ जन्मती हैं जो प्रक्रिया, फल और प्रयोजन का निर्णय करती हैं, जिसे ‘धर्म-पूर्ण विचार’ की संज्ञा है।
- चित्त जब बुद्धि का संकेत ग्रहण करने योग्य विकसित हो जाता है
तब संतोष की अनुभूति होती है। फलस्वरूप स्वचालित मानव जीवन का प्रादुर्भाव होता है अर्थात् मानव स्व-तंत्रित होता है।
ऐसे स्वतंत्र मानव में अधिक उत्पादन, कम उपभोग, अपव्यय का अत्याभाव होता है तथा वह अधिकाधिक विकास के लिए प्रेरणा स्रोत होता है। मनुष्य में स्वतंत्रता की तृषा पाई ही जाती है।
- अर्थात्
- मन, वृत्ति, चित्त और बुद्धि एकसूत्रता से न्यायपूर्ण व्यवहार एवं धर्मपूर्ण विचार के लिए सत्य प्रतीति होता है।
बुद्धि जब आत्मा का संकेत ग्रहण करने योग्य विकास को पाती है
- तब ‘स्व-बोध’ होता है जिसे ‘आत्मबोध’ भी कहते हैं। आत्मबोध से सत्य संकल्प होता है। सत्य संकल्प मात्र सत्य पूर्ण ही है।
अर्थात्