• मन, वृत्ति, चित्त और बुद्धि आत्मानुशासित होने पर न्यायपूर्ण व्यवहार धर्म-पूर्ण विचार में सत्यानुभूति के कारण प्रतिष्ठित होता है।

पूर्वानुषंगिक संकेत ग्रहण योग्यता का प्रादुर्भाव शक्ति की अंतरनियामन प्रक्रिया से ही है। यह व्यवहार का विचार में, विचार का इच्छा में, इच्छा का संकल्प में तथा संकल्प का अनुभव में अथवा मध्यस्थ क्रिया में प्रत्यावर्तन ही है।

अपराध के अभाव में आशा का प्रत्यावर्तन,

  • अन्याय के अभाव में विचार का प्रत्यावर्तन,
  • आसक्त के अभाव में इच्छा का प्रत्यावर्तन तथा
  • अज्ञान के अभाव में संकल्प का प्रत्यावर्तन होता है।
  • अत:

अपराधहीन व्यवहार के लिए व्यवस्था का दबाव,

  • अन्यायहीन विचार के लिए सामाजिक आचरण का दबाव,
  • आसक्ति रहित इच्छा के लिए अध्ययन एवं संस्कार का दबाव तथा
  • अज्ञान रहित बुद्धि के लिए अन्तर्नियामन अथवा ध्यान आवश्यक है, जिससे ही प्रत्यावर्तन क्रिया सफल है।
  • ध्यान का अर्थ समझने के लिए मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि को केन्द्रित करना और समझने - अनुभव करने के उपरांत प्रमाणित करने के लिए मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि को केंद्रित करना।

अर्थ बोध होने के लिए तथा अर्थ बोध को प्रमाणित करने के लिए ध्यान होना आवश्यक है। यही ध्येय है। सर्वमानव ध्याता है।

अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि मानवीयतापूर्ण व्यवस्था, सामाजिक आचरण, अध्ययन और संस्कार के साथ ही अंतर्नियामन आवश्यक है, जिससे चरम विकास (जागृति) की उपलब्धि संभव है। - व्य.द. 142-144; १९७८/अध्याय १७

(E) अध्ययन वस्तु

मानव परम्परा में अध्ययन की सम्पूर्ण वस्तु अस्तित्व, अस्तित्व ही सह-अस्तित्व, अस्तित्व में परमाणु में विकास, संक्रमण, जीवन-पद, जीवनी क्रम, जीवन-जागृति क्रम, जागृति, और रासायनिक भौतिक रचना विरचनाओं का बोध होना है। यही सार्थक अध्ययन है।

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