इस विधि से मानव के स्वरुप का प्रमाण:
- प्रत्यावर्तन में ज्ञान विज्ञान विवेक के रुप में,
- परावर्तन में कार्य व्यवहार व्यवस्था में भागीदारी के रुप में प्रमाणित होता है।
यही जागृत परंपरा है। पीढ़ी से पीढ़ी इसको बनाये रखना हर मानव का कर्त्तव्य और दायित्व है।
परावर्तन प्रत्यावर्तन क्रिया के संबंध में काफी अध्ययन संभव हो गया है। इसी क्रम में परंपरा में शिक्षा-संस्कार एक अनूस्युत क्रिया है। परावर्तन विधि से अध्यापन, प्रत्यावर्तन विधि से अध्ययन होना पाया जाता है। अध्यापन एक श्रुति अथवा भाषा होना सुस्पष्ट है। भाषा का अर्थ है अस्तित्व में वस्तु होना सुस्पष्ट हो चुकी है, भाषा के अर्थ के स्वरुप में अस्तित्व में वस्तु बोध होना ही मूल आशय है। यही प्रत्यावर्तन क्रिया है। हर वस्तु बोध अनुभव मूलक विधि से परावर्तित हो पाती है। इस विधि में अध्ययन कार्य अनुभवगामी पद्घति से होना स्पष्ट हुई। यही प्रत्यावर्तन की महिमा है अथवा उपलब्धि है। इस विधि से परावर्तन पश्च्यात अनुभव होना ही अध्यापन क्रिया है। अर्थ बोध होना और अनुभव होना अध्ययन का फलन है। अर्थ बोध होने तक अध्ययन है, पश्च्यात अनुभव होना प्रत्यावर्तन का अमूल्य फल है। अर्थ बोध का अनुभव के अर्थ में प्रत्यावर्तित होना एक स्वाभाविक क्रिया है। क्योंकि हर अर्थ का अस्तित्व में वस्तु बोध होता है। अनुभव महिमा की रोशनी से वंचित होकर अध्ययन में वस्तु बोध होता ही नहीं। अभी तक भी जितने वस्तु बोध हुई हैं, ये सब अनुभव में ही प्रमाणित होकर अध्ययन के लिए प्रस्तुत हुए हैं। - क.द. 156–158
(G) ‘अध्ययन’ होने का तात्पर्य = ‘वस्तु’ बोध होना = अवधारणा
सार्थक ज्ञान विज्ञान विवेक सम्पन्नता ही मानव परम्परा में जागृति का वैभव होना स्वाभाविक है।
समझदारी के लिए ध्यान अर्थात् मन लगाना एक अवश्यंभावी कार्य है। आवश्यकता के आधार पर मन लगना बन जाता है। मन लगने के आधार पर समझदारी मानव का स्वत्व होना ही है क्योंकि अध्ययनपूर्वक ही मानव समझदारी सम्पन्न होता देखा गया है। हर मानव ध्यानपूर्वक अध्ययन करने से समझदारी संपन्न हो जाता है। ध्यानपूर्वक अध्ययन करने का मतलब जो शब्दों को सुनते हैं उनका अर्थ स्वीकृत होना ही बोध है यही अध्ययन है। इसका मतलब हुआ अर्थ बोध होना ही अध्ययन है। अर्थ बोध होने का प्रमाण अस्तित्व में वस्तु का बोध होना। अस्तित्व में वस्तु का बोध होना ही सहअस्तित्व के बोध का स्वरूप है इसमें हर नर-नारी बोध सम्पन्न होना होता है।
अस्तित्व में जो भी वस्तुएँ हैं उन सबका सहअस्तित्व में वैभव होना समझ में आने के उपरान्त स्वयं भी सहअस्तित्व में होना बोध हो जाता है। होने का स्वरूप और वातावरण यह दोनो स्थितियाँ सहअस्तित्व दर्शन से स्पष्ट हो जाती हैं फलस्वरूप मानव यथास्थिति को पहचानने में समर्थ हो जाता है। अर्थात् जागृति सम्पन्न स्थिति को समझने में सम्पन्न हो जाता है। जागृति के आधार पर यथास्थितयों को पहचानने की स्थिति में विज्ञान और विवेक सम्मत निश्चयन सहित कार्यकलापों में प्रवृत्त होना पाया जाता है।