तर्क संगत विधि से मानवीय व्यवस्था को हम सोच पाते हैं हर व्यक्ति को ज्ञान सम्पन्न होने की आवश्यकता है, ज्ञान ही समझ है। समझ ही विज्ञान और विवेक के रूप में योजित होता है प्रयोजित होने के क्रम में प्रक्रिया प्रणाली की विधि में तकनीकी को प्राप्त करना होता है।

अस्तित्वमूलक मानव केन्द्रित चिन्तन ज्ञान, दर्शन, आचरण ध्रुवीकृत रूप में अध्ययन गम्य होना देखा गया है। जीवन ज्ञान जीवन में सम्पन्न होने वाली क्रियाओं का परस्परता सहज ध्रुव बिन्दुओं के आधार पर उभय तृप्ति विधि सर्व शुभ एवं समाधान से देखा गया अभिव्यक्तियाँ है। जैसा मन और वृत्ति में सामरस्यता का बिन्दु, विश्लेषण, तुलन पूर्वक आस्वादन के रूप में पहचाना गया है। यह नियम, न्याय, धर्म, सत्य में अनुभूत होने के उपरान्त ही सार्थक हो पाता है। इसके लिये अर्थात् ऐसे अनुभूति के लिये अध्ययन क्रम से आरंभ होता है। अध्ययन अवधारणा क्षेत्र का भूरि-भूरि वर्तमान विधि है। इस विधि से जितनी भी अवधारणाएँ अध्ययन से सम्बद्घ होता गया, उतने ही अवधारणा के आधार पर वृत्ति सहज न्याय, धर्मात्मक तुलन, कम से कम न्याय तुलन सम्पन्न विचार के आधार पर किया गया आस्वादन सहित, सम्पन्न किया गया सभी चयन न्याय रूप होना देखा गया है। इसी प्रकार चिन्तनपूर्वक जब चित्रण, तुलन, विचार, आस्वादन और चयन क्रियाएँ सम्पन्न होते हैं न्यायपूर्वक व्यवस्था में प्रमाणित होना देखा गया। अवधारणाएँ स्वाभाविक रूप में ही अस्तित्व सहज होने के आधार पर सह-अस्तित्व रूप होने के आधार पर अनुभूत होना अर्थात् जानना-मानना और उसके तृप्ति बिन्दु को पाना ही अनुभव है।

जानना-मानना-पहचानना ही अवधारणा है।

इसमें तृप्ति बिन्दु को पा लेना ही अनुभव है।

इसे कार्य-व्यवहार व्यवस्था में व्यक्त कर देना प्रामाणिकता है।

पूर्ण बोध सहित सम्पन्न होने वाले संकल्प, चिन्तन, चित्रण, न्याय, धर्म, सत्य रूपी तुलन, विश्लेषण आस्वादन सहित किया गया सम्पूर्ण अभिव्यक्तियाँ, व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करता हुआ ही देखने को मिलता है। इस विधि से जागृतिपूर्ण मानव ही अस्तित्व में भ्रम बन्धनों से मुक्त होना स्पष्ट किया जा चुका है। जागृति विधि, अध्ययन रूपी साधना विधि से सर्वाधिक उपयोगी, सदुपयोगी, प्रयोजनशील होना देखने को मिला है। इस विधि से साध्य, साधक, साधन का सामरस्यता स्वयं स्फूर्त विधि से सम्पन्न होना देखा गया है।– आ.व. 154, 155

(H) जागृत परम्परा की आवश्यकता

अनुभव परंपरा में यह देखा गया है कि मानव ही प्रमाण का आधार और गति है। अभिव्यक्ति संप्रेषणा क्रम में वाङ्मय एक साधन है। वाङ्मय में कहा हुआ, सुना हुआ, इंगित किया हुआ और इंगित हुआ, अनुमान प्रस्तुत किया गया, अनुमान सम्पन्न हुआ गया बोध गामी हुआ और बोध गम्य हुआ। इन वाङ्मय में कहा-सुना ही जा सकता है। इससे अधिक कुछ होता है - अवधारणा और बोध संबंधी अनुमान ही बन सकते हैं। इसी अनुमान के पुष्टि में चित्रण-चित्र

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