को देखने का स्वीकृति भी होना पाया जाता है। इसी प्रकार संपूर्ण चित्रण और वाङ्मय सुनने देखने की क्रिया को पूरा करता है। पढ़ना भी सुनना ही है। यह जिम्मेदारी के साथ पढ़ने पर सुनना बनता है, इसको देखा गया है।

चित्रण विधि का अनेक विधियाँ बनते हैं। जागृत व्यक्ति अपने उद्गार को चित्रित कर सकते हैं और भाषा-साहित्य को कला सहित सत्य आस्वादन सूत्र से सूत्रित कर सकते हैं। विचार और चिन्तनशीलता के लिये अबोध व्यक्ति में अनुमान सहज मानसिक परिस्थितियाँ बनता है और जागृत व्यक्ति के सम्मुख अनुभव सहज कसौटी में परीक्षण करने के लिये सहज वस्तु के रूप में होते हैं। अतएव सत्यबोध और अनुभव जिनमें सम्पन्न हुआ रहता है उनका अनुमोदन और मूल्यांकन सदा-सदा उपलब्ध रहता है। इसी प्रामाणिकता पूर्ण परंपरा क्रम में हर बिन्दुओं, हर आयामों, दिशा, कोण, परिप्रेक्ष्यों में सार्थकता सहज मूल्यांकन होता है फलस्वरूप समाधान केन्द्रित विधि से सम्पूर्ण आयामों में मानव सहज जागृति सार्थक होना स्वाभाविक है। इसलिये जागृत परंपरा की आवश्यकता है। - आ.व. 103-104

भूमि स्वर्गताम् यातु, मनुष्यो यातु देवताम्।

धर्मो सफलताम् यातु, नित्यं यातु शुभोदयम्।।

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