हर जीव जीना चाहता है, जीने का मतलब संवेदनाओं को व्यक्त करना है। इससे अधिक कुछ नहीं है।
ज्ञानावस्था में मानव अस्तित्व पुष्टि सहित सुख धर्मी है, यह भी इसके साथ स्पष्ट किया गया है। समाधान ही सुख का प्रमाण स्वरूप है। सर्वतोमुखी समाधान, मानव अपने समझदारी को प्रमाणित करने के क्रम में व्यक्त करता है। यह अभिव्यक्ति, संप्रेषित हर मानव में, से, के लिए अध्ययन, बोध, अनुभव, प्रमाण के लिए पहुँच पाता है, स्वीकार हो पाता है। इससे यह भी पता लगता है मानव सहअस्तित्व में अनुभवमूलक विधि से ही सर्वतोमुखी समाधान को व्यक्त करता है, जिससे मानव कुल का उपकार होना स्वाभाविक है। मानव कुल के उपकार का तात्पर्य मानव जागृति परंपरा में, मानव सार्वभौम व्यवस्था में, मानव अखण्ड समाज में, मानव कम से कम परिवार व्यवस्था में होने से है। परिवार व्यवस्था में भी मानव, मानव के लिए अथवा परिवार के लिए प्रेरकता है ही, इस विधि से समाधान उपकार से जुड़ा ही रहता है। अथवा उपकार विधि से समाधान जुड़ा रहता है। इस प्रकार मानव में समझदारी ही देखने का तात्पर्य है, समझना ही देखना है। - क.द. 126-126
अर्थात्,
पदार्थावस्था में
जैसे पदार्थावस्था विकास क्रम में अनेक यथास्थितियों से होते हुए रूप, गुण, स्वभाव, धर्म को व्याख्यायित करना, छोटे से छोटे, बड़े से बड़े भौतिक वस्तु के लिए व्यवस्था सम्पन्न हो गया है। यथा आकार, आयतन, घन से रूप; सम, विषम, मध्यस्थ के रूप में गुण; संगठन-विघटन के रूप में स्वभाव और अस्तित्व रूप में धर्म को समझा चुके हैं। इससे पता चलता है, सिंधु के एक बिन्दु को परीक्षण करने मात्र से संपूर्ण सिंधु के पानी को हम समझ चुके होते हैं। अध्ययन विधि इसी प्रकार सार्थक हो पाता है।
प्राणावस्था में
उक्त प्रकार से प्राणावस्था का भी अध्ययन यथा आकार, आयतन, घन से रूप; सम विषम मध्यस्थ के रूप में गुण; सारक मारक के रूप में स्वभाव और अस्तित्व सहित पुष्टि धर्म होना समझा चुके हैं।
जीवावस्था में
इसके आगे जीवावस्था में जीवन और शरीर संयुक्त रूप होते हुए कुछ जीवों में यह प्रमाणित हुआ है। इसके स्पष्टीकरण में सप्त धातुओं से रचित शरीर, समृद्घ मेधस तंत्र और मानव के निर्देश संकेतों को ग्रहण करने की क्षमता संपन्न जीवों में जीवन का होना प्रमाणित होता है। ऐसे जीवों में जीवन में भी आकार, आयतन, घन होता है। शरीर में भी होता है। जीवन अति सूक्ष्मतम क्यों न हो। जीवन में भी गुण सम, विषम, मध्यस्थ प्रभावित रहता ही है। मनुष्य में जीवन प्रधान रहता है। इसीलिए, शरीर का सम, विषम, मध्यस्थ गुण गौण हो जाता है। जीवों में स्वभाव, धर्म संयुक्त रूप में होता है। क्रूरता, अक्रूरता शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में स्पष्ट हो पाता है। जीने की आशा धर्म भी संयुक्त रूप में स्पष्ट होता है। सम्पूर्ण जीव वंशानुषंगीय विधि से व्याख्यायित है।