ज्ञानावस्था में

इसी प्रकार आगे मानव का भी सम, विषम मध्यस्थ गुणों का स्पष्टीकरण हो पाता है। मानव में भी गुण सर्वाधिक मध्यस्थ के पक्ष में है जो स्वयं के वैभव के रूप में व्यक्त होता है। मानव जब तक भ्रमित रहता है, तब तक स्व का होना सर्वोपरि, अन्य को गौण मानता है। इसी प्रवृत्ति का प्रकटन द्रोह, विद्रोह, शोषण, युद्घ के रूप में सुदूर विगत से ही स्पष्ट होता आया है। इसमें भी स्व वैभव की ही स्वीकृति रहती है। स्व वैभव को शुभ माना रहता है। जागृति पूर्वक सर्व शुभ के साथ ही स्व वैभव के होने के तथ्य को समझ पाता है, भ्रमवश इससे अनभिज्ञ रहता है। जब इसमें निष्ठा हो जाती है, जागृत हो जाता है, तब विषम गुणों से मुक्त हो जाता है। जब तक विषम गुणों से मुक्त नहीं होता, तब तक कुंठा, निराशा, प्रताड़ना प्रभावशील रहता है। इसी को मानव परंपरा में दुख कहते हैं। जागृत मानव का गुण सदा-सदा मध्यस्थ होना पाया जाता है।

इसका सार्वभौम स्वरूप जागृत परंपरा को बनाये रखना, सार्वभौम व्यवस्था को बनाये रखना, अध्ययनपूर्वक अखण्ड समाज सूत्र को प्रमाणित किये रखना है। यह परिवार में न्याय को प्रमाणित किये रहने के रूप में प्रकट होता है। इन सभी तथ्यों को अध्ययन करने में संपूर्ण मानव के लिए शुभ, समाधान, सत्य का सुस्पष्ट नजरिया प्रमाणित होता है। इसी की आवश्यकता है। इसी परंपरा विधि से संपूर्ण अध्ययन समझ में आता है। मानवीय गुणों से ही मानव की मौलिकता परस्पर समझ में आती ही है। इसी प्रकार हर अवस्था, हर पद में विद्यमान इकाइयों का उन उनके गुण, स्वभाव, धर्म रूप के साथ अभिव्यक्त रूप में प्रमाणित होती रहती है। इनमें से मनुष्य के अतिरिक्त सभी अवस्था और पदों में हर इकाई अपने में त्व सहित व्यवस्था के रूप में है ही। मानव भी इकाई होने के कारण संज्ञानीयता पूर्वक संवेदनशीलता में नियंत्रण प्रमाणित होने के पर्यन्त जागृत होने की आवश्यकता है।

मानव का तात्पर्य ही है - सहअस्तित्व में संपूर्ण पद, अवस्था में स्थित जड़-चैतन्य प्रकृति को जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना। इस विधि से मानव में अखण्डता, सार्वभौमता, जीवों में सामुदायिकता, वनस्पति में जातियता, प्रजातियता और पदार्थावस्था में विकासक्रम गत अंशों के संख्या भेद से अनेक यथास्थितियाँ पूर्वक प्रमाणित होना पाया जाता है। अस्तित्व में विविधता होते हुए भी राशि विधि उन अवस्था और पद भेद से मानव कुल पहचानने की व्यवस्था, सहअस्तित्व सूत्र व्याख्या से अध्ययनगम्य है। – क.द. 136-139

(E) मात्रा और उसका स्वरूप

मात्रा रूप, गुण, स्वभाव, धर्म का अविभाज्य वर्तमान है। कोई ऐसी इकाई नहीं है जिसमें रूप, गुण, स्वभाव, धर्म न हो। मात्रा का मूल रूप परमाणु में ही आंकलित होता है क्योंकि परमाणु ही तात्विक रूप में अस्तित्व में निश्चित आचरण सहित व्यवस्था व समग्र व्यवस्था में भागीदारी प्रकाशमान है।

एक-एक के रूप में जो वस्तु विद्यमान है, वस्तु का तात्पर्य वास्तविकता को व्यक्त करने से है। वास्तविकता हर वस्तु में त्व सहित व्यवस्था है। वास्तविकतायें रूप, गुण, स्वभाव, धर्म तक एक दूसरे के साथ अविभाज्य रूप में वर्तमान हैं। अर्थात् मात्रा के साथ रूप, गुण, स्वभाव, धर्म अविभाज्य रूप में व्यक्त है। व्यक्त होने के मूल में सहअस्तित्व की अभिव्यक्ति, संप्रेषणा और प्रकाशन है। सहअस्तित्व में प्रत्येक एक इकाई, व्यापक वस्तु में डूबा, भीगा, घिरा होने के रूप में स्पष्ट हो चुका है। व्यापक वस्तु संपूर्ण एक-एक में पारगामी और पारदर्शी होना भी स्पष्ट

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