हो चुका है। प्रत्येक एक-एक व्यापक में भीगे रहने के फलस्वरूप ही ऊर्जा सम्पन्न, चुम्बकीय बल सम्पन्न होना पाया जाता है।
प्रत्येक परमाणु ही मूल मात्रा है। ऐसे अनेक परमाणु अणु के रूप में, अनेक अणु अणु रचना के रूप में, ऐसे रचनायें पदार्थ व प्राणावस्था के रूप में होना भी पहले से स्पष्ट किया है। हर प्रजाति में दो अंश दो से अनेक अंशों से घटित परमाणु अपने-अपने आचरणों को स्पष्ट किये हैं।
मूल मात्रा परमाणु होना इसलिए स्पष्ट हुआ है कि इकाई जो परिभाषित होती है यह स्वयं में व्यवस्था हो और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करती हो। इकाई व्यवस्था में न हो ऐसी इकाइयों में भी व्यवस्था में भागीदारी की प्रवृत्ति होना पायी जाती है जैसा परमाणु अंश और भ्रमित मानव। परमाणु अंश स्वयं में व्यवस्था को प्रमाणित नहीं कर पाता अर्थात् निश्चित आवश्यकता को व्यक्त नहीं कर पाता इसलिए हर परमाणु अंश, परमाणु में भागीदारी करने, फलत: व्यवस्था को प्रमाणित करने के अर्थ में प्रवर्तनशील है। इसका प्रमाण यह है कि हर परमाणु अंश किसी न किसी परमाणु में समा जाता है। अथवा एक से अधिक परमाणु अंश एक दूसरे को पहचानते हुए परमाणु के रूप में कार्यरत हो जाते हैं, फलत: निश्चित आचरण ही व्यवस्था के रूप में ख्यात होता है। इससे पता चलता है कि परमाणु अंश एक दूसरे को पहचानते हैं और निर्वाह करते हैं, परमाणु में निश्चित आचरण स्पष्ट है। - क.द. 114
मानव, मानव को पहचानना, अभी आवश्यकता है। मानव को पहचानने का एक ही सूत्र है - मानवत्व, मानव लक्ष्य के अर्थ में ही होना आवश्यक है। मानव लक्ष्य - समाधान, समृद्घि, अभय सहअस्तित्व है। मानवीय लक्ष्य को प्रमाणित करने के क्रम में ही, मानवीयतापूर्ण आचरण को स्पष्ट कर पाते हैं। इसका प्रमाण मूल्य, चरित्र, नैतिकता के रूप में है। इसे सार्वभौम रूप से अथवा सर्वमानव में सफल करना ही अथवा होना ही जागृत मानव परम्परा का वैभव है। इसी आधार पर हर मानव स्वयं में मानवत्व सहित व्यवस्था हो पाता है, समग्र व्यवस्था में भागीदारी कर पाता है, अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी कर पाता है। अत: अस्तित्व में हर इकाई मात्रा के रूप में ख्यात है, मानव भी मानवत्व को पहचानकर निश्चित मानवीय आचरण पूर्वक मानवीय लक्ष्य को प्रमाणित करते हुए मात्रा के रूप में गण्य होता है। - क.द. 136, 139
अस्तित्व में चार अवस्थाएँ, वंशानुषंगीयता एवं संस्कारानुषंगीयता:-अस्तित्व सहज रूप में ही सह-अस्तित्व, नित्य संबंध स्थिति में ही हैं क्योंकि पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था एवं ज्ञानावस्था- ये संबंधित हैं ही। संबंध का तात्पर्य ही है, पूर्णता के अर्थ में अनुबंधित रहना। इसके निर्वाह होने के क्रम में चारों अवस्थाओं में विभिन्न रूपों में विधियाँ प्रभावशील हैं- ऐसा देखने को मिलता है। जैसे- सम्पूर्ण पदार्थावस्था नियम पूर्वक, संबंधों को निर्वाह करता हुआ देखने को मिलता है। नियम 'त्व’ सहित व्यवस्था है, यही संतुलन है। यह 'त्व’ सहित व्यवस्था सभी अवस्था में ही सार्थक होता हुआ प्रमाणित है। यह प्रमाण है कि पदार्थावस्था ही प्राणावस्था में उदात्तीकृत हुआ वैभव है।