उदात्तीकृत होने का तात्पर्य, रासायनिक वैभव के रूप में परिवर्तित होने से है। क्योंकि पदार्थावस्था की वस्तुएँ स्वयं स्फूर्त विधि से रासायनिक द्रव्यों के रूप में परिवर्तित होती है। फलस्वरूप, प्राणावस्था का वैभव प्रमाणित है। प्राणावस्था का मूल रूप प्राण कोषा एवं उसमें निहित रचना विधि सहित सूत्र और विभिन्न प्रकार की रचनाएँ, बीजानुषंगीय एवं वंशानुषंगीय भेदों में देखने को मिलता है। जीव शरीर एवं मानव शरीर भी प्राण कोशिकाओं से रचित होता है। वे वंशानुषंगीय सूत्रों के आधार पर वैभवित रहते हैं। जीवावस्था और ज्ञानावस्था में जीवन और शरीर संयुक्त साकार रूप है, यह परंपरा देखने को मिलती है। इनमें से मानव परंपरा एक है, जीवों की परंपराएँ अनेक हैं। जीव परंपराएँ अनेक वंशों के रूप में प्रतिष्ठित हैं। और वंशों के रूप में ही प्रमाण भी हैं। जबकि मानव परंपरा में भी अनेक वंशों के रूप में शरीर रचनाएँ देखने को मिलती है। ये सब संस्कारानुषंगी विधि से, एकरूपता को व्यक्त करते हैं, करने के लिए, अवसर संपन्न रहते हैं।
हर जीव की संवेदनशील प्रक्रियाएँ निश्चित रहना ही आचरण का निश्चय है। सुनिश्चित आचरण के आधार पर ही हर मानव समस्त प्रकार के जीवों को पहचानता है। फलस्वरूप आवश्यकता अनुसार कुछ जीवों को नियंत्रित करता अर्थात् पालता और उपयोग करता है। यह सर्वविदित तथ्य है। इसका तात्पर्य यह हुआ जीव संसार संवेदनशीलता की निर्वाह विधि से प्रमाणित आचरण का स्वभाव नाम है। इसी क्रम में जीव संसार का मूल्यांकन स्वभाव के अनुसार और हर जीवों को जीने की आशा सहित होना पाया जाता है। इसलिए जीव संसार आशाधर्मी होना पाया गया है। वनस्पति संसार बीज वृक्षानुषंगी अर्थात् बीज से वृक्ष, वृक्ष से बीज होना सर्वविदित है। वनस्पतियों की पहचान गुणों के आधार पर विदित है। वनस्पतियों में सारक-मारक गुण होना पाया जाता है। सारक गुण का तात्पर्य जीव संसार के लिए अनुकूल होना चाहिये। मारक का तात्पर्य प्रतिकूल होने से है। -भ.व. 246
वनस्पति संसार बीज गुणानुषंगी पहचान है। इसका आचरण गुणों को प्रमाणित करने के अर्थ में निश्चित होना पाया जाता है। इस प्रकार नीम, तुलसी, आम, दूब, बेल, मालति आदि सभी वनस्पतियों को पहचानना मानव में, से, के लिए अति सुलभ हो गया है। इस क्रम से मानव द्वारा वनस्पतियों को पहचानने का आधार बीज गुणानुषंगी होना पाया गया है। इस विधि से वनस्पति संसार को पुष्टि धर्म के साथ पहचाना गया है। वनस्पति किसी न किसी को पुष्टि प्रदान करता ही है। स्वयं में भी पुष्टि संग्रहण करता है। वनस्पति संसार अमूल्य वस्तु है। वनस्पति संसार मानव शरीर संचालन के लिए अति आवश्यक है। वायु को तैयार करने में समर्थ है इसी क्रियाकलाप को प्राणवायु की सृजनशीलता अथवा अप्राण वायु को प्राण वायु में परिवर्तित करने का कार्य वनस्पति संसार में ही होता है। इसका मूल्यांकन अथवा इस पर ध्यान देना मानव कुल के लिए अतिआवश्यक मुद्दा है। - ज.व. 134-138
स्थिति गति संपन्न इकाई व्यवस्था व व्यवस्था में भागीदारी के रुप में है। स्थिति में बल संपन्नता का मतलब स्वयं में व्यवस्था का प्रमाण, गति में शक्ति का मतलब समग्र व्यवस्था में भागीदारी है। मूलत: हर इकाई व्यापक वस्तु में संपृक्त रहने के फलस्वरुप ऊर्जा संपन्नता, बल संपन्नता होना दृष्टव्य है। ऐसी हर इकाई के मूल में परमाणु ही है। परमाणु ही भौतिक, रासायनिक, जीवन क्रिया के रुप में कार्य करता हुआ सुस्पष्ट है। जीवन क्रिया के रुप में जितने