भी परमाणु भागीदारी करते हैं, अर्थात् कार्य करते हैं, वे सब अणु बंधन, भार बंधन से मुक्त रहते हैं। अन्य सभी परमाणु जो भौतिक रासायनिक क्रिया में भागीदारी करते हैं, ये सब अणु बंधन, भार बंधन से युक्त रहते हैं। ऐसे अणु बंधन, भार बंधन वश ही छोटी रचना, बड़ी रचना के रुप में रचित होना पाया जाता है। सबसे छोटी रचना परमाणु ही है। परमाणु ही अणु और अणु रचित रचना के रुप में वैभव को प्रकट करते हैं। ऐसे वैभव का स्वरुप सहअस्तित्व सूत्र से ही अनुप्राणित रहता है।

जैसा, एक परमाणु में एक से अधिक अंश होना, एक अणु में एक से अधिक परमाणु होना, अणु रचना में एक से अधिक अणु होना, ये सब अपने आप में सहअस्तित्व सूत्र से अनुप्राणित रहने वाले प्रमाण हैं। रचनाओं में भौतिक रचना, रासायनिक रचना ही होते हैं। इन रचनाओं में एक दूसरे के लिए पूरक और उपयोगी होना सुस्पष्ट हो चुका है। इन सभी प्रजाति के अणु में, स्थिति और गति दोनों की अभिव्यक्ति निरंतर वर्तमान है। ये कभी रुकने वाला नहीं है। सदा-सदा से ये क्रियाकलाप और प्रकाशन वर्तमान ही है। इसीलिए मानव इन सबका अध्ययन करने योग्य इकाई के रुप में प्रस्तुत है। इसीलिए स्वयं भी स्थिति में व्यवस्था, गति में समग्र व्यवस्था में भागीदारी को मानव को प्रमाणित करना है। तभी मन:स्वस्थता का प्रमाण, परंपरा में प्रस्तुत होता है। मन:स्वस्थता के बिना मानव में सर्वतोमुखी समाधान होना संभव ही नहीं है। इसीलिए मन:स्वस्थता मानव के लिए अत्यावश्यक अथवा परम आवश्यक उपलब्धि है।

इसी क्रम में समझदारी के आधार पर मानव अपने में सर्वतोमुखी समाधान रुपी मन:स्वस्थता के सूत्र में वैभवित होना स्वाभाविक है। ऐसा वैभव ही अर्थात् समाधान संपन्नता ही समृद्घि, अभय, सहअस्तित्व को प्रमाणित करने में योग्य हो जाता है अथवा सफल हो जाता है। यही सफलता मानव परंपरा में, से, के लिए त्राण और प्राण है। त्राण का मतलब स्थिति है, प्राण का मतलब गति है। गति में प्रेरणा होना, वातावरण में अथवा प्रभाव क्षेत्र में व्यवस्था प्रमाणित होना, स्थिति में स्वयं व्यवस्था ही वैभव का सार्थक स्वरुप है। ऐसे वैभव को बनाये रखने में मानव में आशावादी प्रवृत्ति है ही। इसी प्रकार परमाणु में स्थिति में बल, गति में शक्ति का अर्थात् प्रभाव क्षेत्र संपन्न होना पाया जाता है। इस परस्पर प्रभाव क्षेत्र का सुरक्षित रहना ही परस्परता में अच्छी दूरी है। ऐसे प्रभावों से संपन्न हर इकाई परस्परता में अपने-अपने मौलिकता को बनाये रखने में सफल है, इसी का नाम है नियंत्रण।

परस्परता में अच्छी दूरी इस तरह से स्पष्ट हुई कि परस्परता में एक दूसरे का प्रभाव क्षेत्र बना रहे, सुरक्षित रहे। यह प्रभाव क्षेत्र व्यापक वस्तु में ही होना पाया जाता है। स्थिति भी, आकार, आयतन, घन भी व्यापक वस्तु में ही होना पाया जाता है। ये आकार क्रिया सहित ही होना पाया जाता है। हर परमाणु में क्रिया श्रम, गति, परिणाम के रुप में है। श्रम अपने में यथास्थिति का वैभव, गति अपने में प्रभाव को फैलाने का वैभव, परिणाम भिन्न यथास्थिति का वैभव होना पाया जाता है। इस प्रकार हर परिणाम मात्रात्मक व गुणात्मक श्रृंखला में सजा हुआ है। इसी में परिणाम ध्रुव, दीर्घ परिणाम के रुप में होना पाया जाता है। ये मुख्य रुप में यथास्थितियों की स्थिरता, अस्थिरता की गणना में स्पष्ट होती है। प्रत्येक यथास्थितियाँ सहअस्तित्व सूत्र से सूत्रित होने के आधार पर पूरकता और उपयोगिता के अर्थ में सार्थक रहता है। इस प्रकार सभी वस्तु की सार्थकता समझ में आती है।

एक अणु का भी ऐसा ही इतिहास है, एक अणु दूसरे अणु के साथ भी, परमाणु का प्रभाव क्षेत्र संबंधी क्षेत्र नियंत्रण बनाये रखते हुए एक दूसरे के साथ जुड़ कर पिण्ड रुप हो जाते हैं। इसमें मानव का कोई योगदान नहीं रहता है। ये सारे

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