क्रिया कलाप, पूरकता और उपयोगिता विधि से जागृति और उसकी निरंतरता तक में सार्थकता को प्रमाणित किये रहते हैं। सभी अवस्थायें एक दूसरे के साथ जुड़ी हुई होती हैं। जैसे भौतिक क्रिया कलाप को रासायनिक क्रियाकलाप से, रासायनिक क्रिया कलाप को जीवों के क्रिया कलाप से और भौतिक रासायनिक क्रिया कलाप को मानव के क्रियाकलाप से अलग रखते हुए कोई कार्य व्यवहार संपन्न नहीं होता है, ना ही संपन्न किया जा सकता है। ये सब मानव के साथ अविभाज्य रुप में जुड़े ही रहते हैं। इनकी मर्यादायें निभाते ही रहते हैं। इनके साथ मर्यादा निभाने के लिए मानव को जानकारी होने की आवश्यकता है।
मनुष्येतर संपूर्ण प्रकृति मानव के लिए उपयोगी होते हुए मानव, मनुष्येतर प्रकृति के लिए पूरक होने से वंचित रहना ही संपूर्ण समस्याकारी प्रवृत्तियों का आधार रहा है। इससे क्रमागत विधि से जो कुछ भी उपलब्धियाँ मनाकार को सार्थक करने में हुई, उसका भी उपयोग सदुपयोग का रास्ता इसीलिए अड़चन में पड़ गया कि मन:स्वस्थता का भाग अपने आप में उपेक्षित रहा। इसीलिए इस वर्तमान में मन:स्वस्थता का अति आवश्यक होना समझ में आता है। सहअस्तित्व विधि से ही मन:स्वस्थता सर्वसुलभ होना पाया जाता है, यही सर्वशुभ की संभावना सुस्पष्ट है। मानव अपने में समाधान संपन्नता के उपरान्त ही मन:स्वस्थता को प्रमाणित करने में समर्थ होता है। समझ की परिपूर्णता ही मन:स्वस्थता का स्वरुप है। समझ सहअस्तित्व सहज स्वीकृति है। इस प्रकार संपूर्ण ज्ञान स्वीकृति के रुप में है। स्वीकृति, अस्वीकृति का अधिकार हर मानव में निहित है ही।
स्थिति गति का वैभव धरती, सौर व्यूह, अनेक सौर व्यूह, आकाश गंगा, सभी आकाश गंगा में होना पाया जाता है। इसका प्रमाण यह है, परमाणु से लेकर धरती तक सभी अपने अपने स्थिति गति में प्रमाणित होने तक अध्ययन गम्य हो जाता है। यहाँ तक अध्ययन हर मानव के लिए सुलभ है। इसके अनन्तर ऐसे ग्रह गोलों की स्थिति गति की स्वीकृति होती है। इसी प्रकार आकाश गंगा भी अनेक सौर व्यूहों का क्रियाकलाप होने के आधार पर स्थिति गति की स्वीकृति होती है। इसी के साथ व्यापक वस्तु की स्वीकृति रहती है। अतएव स्वीकृति की विशालता में से अपनी आवश्यकताओं को, प्रमाणों के रुप से अध्ययन करना मानव की एक आवश्यकता है। स्वीकृति के आधार पर अध्ययन होने की व्यवस्था मनुष्य की आवश्यकता अनुसार निर्भर है। जानने मानने की विशालता, व्यापक और अनंत के संबंध में स्वीकार चुके हैं। व्यापक और अनंत के बारे में जानने मानने के आधार पर किसी एक देशीय अध्ययन से, एक इकाई के अध्ययन से ऐसी सभी इकाइयों के रुप, गुण, स्वभाव, धर्म के प्रति आश्वस्त होना स्पष्ट हो चुका है। यह भी स्पष्ट हो चुका है कि समुद्र के एक बूंद पानी के परीक्षण से पूरे समुद्र का पानी कैसा है, इसको हम स्वीकार लेते हैं। लेकिन जितना है, इसको मापने कौन तैयार होता है, अपनी आवश्यकता के अनुसार नापते हैं।
मानव की आवश्यकता भी सीमित है। नापने की क्रियाकलाप के परीक्षण से पता चलता है कि यह जोड़ना घटाना ही है, नापने में 1, 2, 3 ही लगता है। तौलने में भी। इसी प्रकार घटाना भी बनता है, एक तरफ जोड़ते हैं, एक तरफ घटता भी है। जोड़ने, घटाने दोनों को मिलाने से यथास्थिति ही हाथ लगती है। जैसा है, जितना है, यही यथास्थिति है। ऐसी यथास्थिति न ज्यादा है, न कम है, न घटता है, न बढ़ता है। इस स्थिति से अस्तित्व न घटता, न बढ़ता है। इस विधि से हमारी परीक्षण करने की सीमायें, अपनी आवश्यकता पर निर्भर रहना स्पष्ट हो जाती हैं। जोड़, घटाने के क्रम में ऋण अनन्त, धन अनन्त रुपी अर्थ मानव स्वीकार चुका है। इस प्रकार से अस्तित्व में अनन्त की कल्पना अथवा स्वीकृति, कुछ हद तक संख्याकरण न कर पाने के रुप में मानव परंपरा में स्वीकृत हो चुकी है। अभी तक