व्यापक वस्तु का बोध अप्रचलित है। व्यापक वस्तु का बोध होने के उपरान्त अनन्त वस्तुएं कैसे हैं, इसका उत्तर मिल गया। अतएव समझदारी रुपी अध्ययन, व्यापक में अनन्त अविभाज्य होने का अर्थ सर्वतोमुखी समाधान होने का आधार होना पाया गया। इसी क्रम में हर इकाई अपने स्थिति, गति के साथ वर्तमान है।
वर्तमान का तात्पर्य वर्तते रहना है। वर्तते रहने का तात्पर्य क्रियाशील रहना है। क्रियाशील रहने का तात्पर्य आचरण स्पष्ट रहना है। आचरण स्पष्ट रहने का तात्पर्य स्थिति में त्व सहित व्यवस्था, गति में समग्र व्यवस्था में भागीदारी से है। यह धरती एक सौर व्यूह सूर्य के साथ जुड़े सभी ग्रह गोलों के समूह में भागीदारी करती हुई समझ में आती है। सभी ग्रह गोल अपने-अपने स्थिति गति में अनवरत कार्यरत हैं। एक दूसरे के हस्तक्षेप के बिना सभी एक दूसरे को पहचानते हुए निश्चित आचरण कर रहे हैं और सौर व्यूह की व्यवस्था में भागीदारी कर रहे हैं।
इसीलिए स्थिति है ही, गति भी है। इसी आधार पर धरती की स्थिति गति सबंधी अध्ययन भी हमारे समझ आना स्वाभाविक है। इसी क्रम में एक सौर व्यूह अनेक सौर व्यूह के साथ निश्चित अच्छी दूरी में कार्य विन्यास करते हुए, सौर व्यूह त्व के वैभव को प्रकाशित करता है। ऐसे अनेकानेक सौर व्यूहों को अथवा ग्रह-व्यूहों को आज कल वैज्ञानिकों ने आकाश गंगा नाम दिया। आकाश गंगा भी अनेक होना पाया जाता है। ये सभी परस्परता में अच्छी दूरी में रहते हुए बड़ी व्यवस्था को बनाये रखने में भागीदारी करते हैं। - क.द. 145-150
वर्तमान का तात्पर्य, स्थिति-गति की निरंतरता है। सह-अस्तित्व, अपने में, स्थिति-गति सहित वैभवित है। उसकी निरंतरता ही वर्तमान है। अस्तित्व स्वयं सत्ता में संपृक्त प्रकृति है। इसका, सह-अस्तित्व रूप में होना, वर्तमान सहज है। सह-अस्तित्व ही, स्थिति व गति के रूप में देखने और समझने को मिलता है। सत्ता, अर्थात् साम्य रूप में स्थित ऊर्जा में सम्पूर्ण प्रकृति अर्थात् सम्पूर्ण इकाईयां संपृक्त हैं। संपृक्त होने के फलस्वरूप अविभाज्यता व सह-अस्तित्व प्रमाणित है। सत्ता, अपने स्वरूप में व्यापक-साम्य है, यह समझ में आता है। “व्यापक’’ - इस नामकरण का तात्पर्य यह है कि - “सत्ता कहां तक फैली है ? इसका अंत कहां है ? - इसका पता नहीं लगता। सत्ता में प्रत्येक एक का, स्थिति-गति में होना, देखने को मिलता है। इस प्रकार सत्ता, व्यापक रूप में, स्थिति पूर्ण है, तथा इसकी निरंतरता है। सत्ता में संपृक्त प्रकृति, स्थिति और गति के, अविभाज्य रूप में संपूर्णता व पूर्णता के अर्थ में स्थितिशील है। ऐसी प्रकृति इस धरती में चार अवस्थाओं में स्पष्ट हो चुकी है। चौथे पद में जागृत मानव, दृष्टा पद को पा चुका है। दृष्टा पद के आधार पर ही, यह अस्तित्व कैसा है ? यह समझ में आ गया है। कितना है ? - इसका उत्तर मनुष्य की आवश्यकतानुसार मिलता ही रहेगा, यह भी समझ में आया है। इस प्रकार, आवश्यकतानुसार अस्तित्व में सब कुछ समझ में आता है। इसी क्रम में न्याय, धर्म, सत्य मानव कुल सहज अभिव्यक्ति, संप्रेषणा व प्रकाशन है। - म.वि. 149-150
(B) प्रकाशन, प्रतिबिम्ब, प्रभाव एवं पहचान
प्रत्येक एक अपने रूप, गुण, स्वभाव, धर्म सहित प्रकाशमान है। यही परस्पर पहचान का आधार है।