(*इस ढंग से) प्रत्येक आकार अथवा इकाई सभी ओर प्रतिबिम्बित रहता है। इकाई के सभी ओर स्थित इकाइयों पर आशित इकाई का प्रतिबिम्ब रहता ही है। इस प्रकार से एक दूसरे के पहचान की विधि बनी रहती है। पहचान विधि को बनाने की जरूरत नहीं है। इस विधि से हर वस्तु, हर वस्तु पर प्रतिबिम्बित रहता ही है। हर वस्तु प्रकाशमान है। उक्त विधि से सोचने पर यह प्रश्न निर्गमित हो सकता है, क्या एक दूसरे को पहचानने के लिए प्रकाश की जरूरत नहीं है ? जैसा सूर्य प्रकाश धरती पर उपलब्ध है। इसका उत्तर यही है, हम अभी मानव जो कुछ भी प्रकाश पहचानते हैं, आँखों से प्रकाश को पहचानने के आधार पर ही है। जबकि, सभी वस्तु प्रकाशमान है ही। इसका कारण यही है, हर परमाणु में श्रम, गति, परिणाम रूपी क्रिया बना ही रहता है। गति के फलन में शब्द, ऊष्मा, विद्युत, तरंग प्रकट हुआ रहता है। क्रिया के मूल में ऊर्जा सम्पन्नता और चुम्बकीय बल सम्पन्नता स्वयं सिद्घ रहता ही है। इन चारों प्रकार की बल सम्पन्न इकाई के वैभव को विद्यमानता और प्रकाशमानता के रूप में प्रकाशित किये रहते हैं अर्थात् प्रकाशित रहते हैं। इससे हमें यह समझ में आता है कि हर वस्तु प्रकाशमान है। प्रकाशमानता का साक्ष्य प्रतिबिंबन के रूप में इकाई के सभी ओर होना सुस्पष्ट हो चुका है।

एक दूसरे को पहचानने के लिए प्रतिबिंबन ही आधार है, यह तथ्य समझ आ चुका है। इसके लिए किसी भी एक कमरे में किसी वस्तु को रखें, स्वाभाविक रूप में सभी ओर से हम बैठें, वह वस्तु हम सबकी नजरों में आता ही है। दूसरी विधि से, हमारी आंखें, चक्षु रचना के अनुसार अधिक प्रकाश के बिना अंधेरे कमरे में कोई चीज दिखता नहीं। कमरे में रखी वस्तु का प्रतिबिंबन में कोई गति होती नहीं। यह इस विधि में समझ में आता है, रात्रि बेला से संचालित होने वाले उल्लू और सदृश्य आँख वाले जीव जानवर उनके आवश्यकीय वस्तु को पहचानते ही हैं। जैसे उल्लू, चमगादड़ फलों को पहचानते ही हैं, हिरण घास को पहचानता है। जबकि, मनुष्य नहीं पहचानता है। मनुष्य के न पहचानने मात्र से वस्तु अपने को प्रस्तुत करने में त्रुटि करेगा ऐसा भी नहीं हुआ, पहचानने वाले और कोई नहीं है, ऐसा भी नहीं हुआ।

हाथी, चींटी, उल्लू को भी दिखता है, इस बात पर विचार किया जा सकता है। शोध विधि से निष्कर्ष निकलता है कि उनकी-उनकी आवश्यकतानुसार आँखे बनी रहती हैं। उसी प्रकार पाँचों संवेदनाओं का आधार बना रहता है क्योंकि आँख से कुछ, नाक से कुछ, जीभ से कुछ, त्वचा से कुछ, कान से कुछ पहचानने की व्यवस्था जीवन्त आदमी में बनी हुई है। इसी प्रकार की व्यवस्था सभी जीव जानवरों में जरूर होगी, ऐसा सोचा जा सकता है। जैसा मेंढक का चमड़ी बनी रहती है, अनेक पक्षियों के पंख विभिन्न तरीके से बने रहते हैं, गाय की चमड़ी और तरह की बनी रहती है, इन सब में स्पर्शीयता उन-उनके आवश्यकता अनुसार भिन्न-भिन्न बने रहते हैं। इस प्रकार मानव शरीर की स्पर्शीयता भिन्न रहना स्वाभाविक रहा। इस बात को हम शरीर ज्ञान से स्वीकार सकते हैं कि मानव शरीर रचना, पाँचों प्रकार की संवेदनाओं को खूबी से व्यक्त कर सकता है, प्रवृत्तियों को संप्रेषित कर सकता है। यह सौभाग्य सभी प्रकार के मानव शरीर में समानता के अर्थ को स्पष्ट करता है। प्रकारान्तर से, संवेदना सभी जीवों में होना पाया जाता है। इस प्रकार जीवावस्था, ज्ञानावस्था के मात्रा के साथ होने वाली क्रियाकलाप को स्पष्ट किये। -क.द. 126-129

प्रतिबिम्ब

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