परिवार क्रम में :-

सम्बोधन प्रयोजन

  • पिता - संरक्षण
  • माता - पोषण
  • पति-पत्नी - यतित्व-सतीत्व
  • पुत्र-पुत्री - अनुराग
  • स्वामी (साथी) - दायित्व
  • सेवक (सहयोगी) - कर्तव्य
  • गुरू - प्रामाणिकता
  • शिष्य - जिज्ञासु
  • भाई-बहन-मित्र - जागृति (समाधान-समृद्घि)

– स.श. 184-185

(B) मानव सम्बन्धों के प्रकार

माता – पिता, पुत्र – पुत्री

  • भाई – बहिन
  • मित्र – मित्र
  • गुरू – शिष्य
  • पति – पत्नी
  • स्वामी (साथी) - सेवक (सहयोगी)
  • व्यवस्था संबंध (व्यवस्था - कार्यप्रणाली)
  • हर सम्बन्धों में पूरकता प्रधान ज्ञान प्रणाली व्यवस्था के रूप में कार्यप्रणाली गति के रूप में सह-अस्तित्व सहज रूप में ही स्पष्ट होता है। हर संबंध एक-दूसरे के पूरक होने के अर्थ में नित्य प्रतिपादन है। अस्तित्व सहज व्यवस्था क्रम में पूरकता विधि प्रभावशील है। इसके मूल में अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व ही है।

हर सम्बोधन में अपेक्षाएँ समाहित रहना पाया जाता है। हर सम्बन्धों के सम्बोधन प्रक्रिया में जागृति की अपेक्षा रहता ही है। उसके साथ तीन सम्बन्ध ही देखने को मिला। ये तीन सम्बन्ध मानव सम्बन्ध, नैसर्गिक सम्बन्ध, और व्यवस्था सम्बन्ध हैं। मानव सम्बन्ध में अपेक्षाएं शरीर पोषण-संरक्षण, समाजगति की अपेक्षाएँ प्रकारान्तर से समायी रहती हैं। पोषणापेक्षा-पोषण प्रवृत्तियाँ तन, मन (जीवन) और धन, के सम्बन्धों में अथवा तन, मन (जीवन) और धन रूपी तथ्यों का पोषण, संरक्षण अपेक्षा और प्रवृत्ति मानव सहज गति होना पाया जाता है। यथा-

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