विपरीत अंतरराष्ट्रीय नीति में विकास नीति, राष्ट्रीय नीति में विधि (न्याय) की अक्षुण्णता बनाये रखने के लिए व्यवस्था, सामाजिक नीति में स्वधन, स्वनारी /स्वपुरुष तथा दया की नीति और व्यक्तिगत जीवन में असंग्रहवादी नीति से ही पोषण संभव है।
उपरोक्त वर्णित उद्देश्य अर्थात् तन, मन और धन के सदुपयोग और तन, मन और धन की सुरक्षा की पूर्ति के लिए तथा तदनुकूल आचरण को व्यवहार में लाने हेतु और तदनुसार विभिन्न स्तरों के गठन की संपर्कात्मक तथा संबंधात्मक परस्परता को विश्वासपूर्वक सुदृढ़ करने के लिये एक समन्वित धर्मनीति तथा राज्य नीति आवश्यक है, जिससे एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था को स्थापित तथा विकसित किया जा सके, जो मानव के जागृति की संपूर्ण संभावनाओं से युक्त हो। ऐसी व्यवस्था मात्र पोषण-प्रधान गुणों व नीतियों से ही संपन्न होगी, जो जागृति का मार्ग प्रशस्त करेगी, जिससे मानव सुखी रहेगा।
उपरोक्तानुसार धर्मनीति तथा राज्यनीति के व्यवहारान्वयन में सहायक सभी विचार तथा व्यवहार पोषक, अन्यथा में शोषक ही सिद्ध होंगे। यह धर्म नीति और राज्य नीति मात्र पोषक होने के कारण सार्वभौमिक निर्विवाद स्थिति को प्राप्त करेगी, और इस विश्व धर्म का पालन सभी मनुष्य, परिवार तथा राष्ट्र निर्विरोध रूप में कर सकेंगे। सम्पूर्ण मानव जाती परस्परता में सह-अस्तित्व की भावना से प्रतिष्ठित होकर एक दूसरे के विकास में हर स्तर पर अर्थात् व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सहायक एवं सहयोगी होगी और फलत: मानव समाज शोषण से मुक्त होगा - व्य.द , १९७८, 152
धर्म-नीति का तात्पर्य
संस्कृति सभ्यता को सुनिश्चित करने के लिए प्राप्त अर्थ ‘तन, मन और धन’ की सदुपयोगात्मक नीतियों का निर्धारण हुआ तथा इन्हें ‘धर्म-नीति’ की संज्ञा दी गई। धर्म-नीति मानव का वैभव है।
धार्मिक नीति चैतन्य पक्ष तथा उससे सम्बद्ध व्यवहार से सम्बंधित है।
धर्मनीति में वैयक्तिक स्तर से सम्पूर्ण मानव समाज में प्राप्त संपर्कों एवं संबंधों पर मनन से मानवीयता, अतिमानवीयता पूर्ण व्यवहार का दर्शन हुआ है जिससे एक से अनेक तक के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ। साथ ही इसके विपरीत अमानवीयता का भी दर्शन हुआ जिससे एक से अनेक तक के विकास को अवरुद्ध करने वाले मार्ग का भी दर्शन हुआ।-व्य.द. १९७८, १४५
राज्यनीति का तात्पर्य
सामाजिकता एकसूत्रता को बनाए रखने के लिए तथा अमानवीयता से मुक्ति के लिए, जिससे मानव को प्राप्त अर्थ-तन, मन और धन की सुरक्षा भी होती हो ऐसी राज्यनीति अध्ययन गम्य हुई। सामाजिक इकाई होने के कारण एक