मानव के तन तथा धन की सुरक्षा के साथ परिवार, समाज तथा राष्ट्र की सुरक्षा स्वयमेव सिद्ध है। यह उसी स्थिति में संभव तथा व्यवहार्य है जब मानव से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जीवन में एकसूत्रता हो।
राज्यनीति से साकार होने वाली उपलब्धि के मूल तत्व हैं :-
स्व-धन, स्वनारी/स्व-पुरुष और दया में निष्ठा एवं विश्वास का स्थापना तथा पर-धन, पर-नारी/पर-पुरुष और पर-पीड़ात्मक व्यवहार से मुक्ति।
वैचारिक पक्ष के परिमार्जन से तथा विकास से ही परधन, परनारी/परपुरुष एवं परपीड़ा युक्त व्यवहार का उन्मूलन संभव है। विचार का परिमार्जन केवल इसके इससे श्रेष्ठ शक्ति के प्रभाव में आने पर ही संभव है क्योंकि यह नियम है कि अविकसित, विकसित के सान्निध्य में ही विकास की प्रेरणा पाता है और विकास को प्राप्त करता है। विचार पक्ष का परिमार्जन मात्र चित्त के प्रत्यावर्तन से ही संभव है जिससे वैचारिक पक्ष में मानवीयता के प्रति आदर का भाव उत्पन्न होकर तदनुरूप व्यवहार संभव है।
राज्यनीति का क्षेत्र अर्थ की सुरक्षा से अधिक संबद्ध होने के कारण इसका संबंध भौतिक वस्तुओं से अधिक है।
अतः इसका धर्मनीति के आश्रय में होना अनिवार्य व अपरिहार्य है।
- संस्कृति, सभ्यता = धर्म नीति
- विधि, व्यवस्था = राज्य नीति - (व्य.द. 1978, अध्याय 16)
अंतर्राष्ट्रीय नीति से राष्ट्रीय नीति को प्रेरणा एवं दिशा, राष्ट्रीय नीति से सामाजिक नीति को प्रेरणा और दिशा, सामाजिक नीति से पारिवारिक नीति को प्रेरणा और दिशा, और पारिवारिक नीति से व्यक्तित्व निर्माण के लिए प्रेरणा और दिशा प्राप्त होती है। इसकी विलोम पद्धति से भी नीति निर्धारण होता है, जिससे कि मानव समाज के लिए व्यक्ति की महत्ता, व्यक्ति के महत्ता के लिए मानव समाज की महत्ता प्रतिपादित होती है। इसके साथ ही व्यक्ति से लेकर सम्पूर्ण मानव समाज की एक सूत्रता का महत्व भी हृदयंगम होता है।
'धर्म नीति और राज्य नीति सहज विवेचना अस्तित्व दर्शन और जीवन ज्ञान का ही फलन है। इससे मानवीयतापूर्ण आचरण, स्वाभाविक विज्ञान का रास्ता बन गया' - संवाद, २०१०
धर्म नीति: परिभाषा
अर्थ की सदुपयोगात्मक नीति ही धर्मनीति है।
- मानव की सार्वभौमिक साम्य कामना ‘सुख’ की अनुभूति हेतु मानव के समस्त सम्पर्क एवं संबंध के निर्वाह के लिए जो निश्चित कार्यक्रम है, उसे ‘मानव धर्म नीति’ की संज्ञा है।