धर्म नीति: आवश्यकता
मानव धर्मनीति सहज समझ तथा परिपालन इसलिए आवश्यक है कि मानव प्रयोग एवं उत्पादन द्वारा प्राप्त अर्थ तथा प्राप्त प्राकृतिक संपदा के सदुपयोग की कामना करता है।
सदुपयोगिता अथवा दुरूपयोगिता का निर्णय चैतन्य पक्ष का है। संस्कृति एवं सभ्यता से प्राप्ति मात्र सुखानुभूति ही है, अर्थात् धर्मनीति का अध्ययन मनुष्य की परस्परता में पाये जाने वाले सम्बन्ध एवं संपर्क का अध्ययन है, क्योंकि मनुष्य संपर्क एवं सम्बन्ध से सुखी और दुःखी हो रहा है न कि वस्तु वाहन आदी से - व्य.द., 1978, 154
धर्म नीति- लक्ष्य अथवा साध्य
अमानवीयता से मानवीयता की ओर गुणात्मक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करने हेतु समाधान, साधन, अवसर तथा व्यवस्था उपलब्ध कराना, जो अतिमानवीयता के लिये प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन देने में समर्थ हो।
प्रत्येक मानव में साध्य को पाने हेतु तीन बातों का होना अनिवार्य :-
1. साधक, 2. साधना, 3. साधन।
- साधक : प्रत्येक मानव को ‘साधक’ की संज्ञा है, वह क्रम से व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र तथा अंतर्राष्ट्रीय भेद से है।
- साधना : तन, मन तथा धन सहित मानवीय दृष्टि, विषय एवं स्वभाव सहित साध्य (मानवीयता एवं अतिमानवीयता) को पाने हेतु प्रयुक्त क्रिया प्रणाली को ‘साधना’ की संज्ञा है।
- साधन : तन, मन व धन ही साधन है। सर्वमानव के लिए जागृति ही साध्य है।
साधन की प्रयुक्ति कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित एवं अनुमोदित भेद से कुल नौ प्रकार की होती है। इन समस्त साधनों को तीन क्षेत्रों में ही प्रयुक्त किया जा रहा है :-
(1) प्राकृतिक क्षेत्र (2) सांस्कृतिक क्षेत्र (3) बौद्धिक क्षेत्र।
सहअस्तित्व व सामाजिकता का अध्ययन व्यक्ति के जागृति एवं व्यवहार के संदर्भ में ही है। मानव धर्मनीति का अध्ययन सहअस्तित्व, सामाजिकता, समृद्धि, समाधान, संतुलन, सच्चरित्रता एवं सुख के उद्देश्य से किया जाता है और यही मानव की आद्यान्त आकांक्षा है।
सहअस्तित्व व सामाजिकता का अध्ययन व्यक्ति के विकास एवं व्यव्हार के सन्दर्भ में ही है
समाज का गठन व्यक्तियों सहित उद्देश्यपूर्ण आचरण संहिता समेत व्यवस्था प्रणाली ही है। समाज से व्यक्ति संपर्क एवं संबंध द्वारा जुड़ा हुआ है। मानव समाज में परस्पर निम्न संबंध दृष्टिगोचर होता हैः